श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11

परिचय
         अब तक हमने जो कुछ सुना और जाना वह हमारी दृष्टि को आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी आँखोँ से चीजों को तो देखता ही है किंतु उसकी दृष्टि में दृष्टिकोण भी उसे देखने समझने में मदद करता है । इसीलिए भिन्न भिन्न व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी अपनी आँखों से देखते हुए भी उस वस्तु को भिन्न भिन्न रूप से समझते हैं। यह दृष्टिकोण में फर्क के कारण होता है। 
     व्यक्तियों का दृष्टिकोण उनके विवेक और ज्ञान पर निर्भर करता है। जिसकी जैसी समझ होती है, जैसा विवेक होता है उसी के अनुरूप वह चीजों को देख समझ पाता है। परमात्मा के स्वरूप को हमने अभी जाना है किंतु उसकी समझ के लिए यह आवश्यक है कि  हमारी दृष्टि संकुचित न हो। बल्कि दृष्टि के साथ ही वह दृष्टिकोण भी हो जिससे हम परमात्मा से सम्बंधित इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें। इसके लिए जो दृष्टि चाहिए उसे दिव्य दृष्टि कहते हैं , एक ऐसी ज्ञानमयी दृष्टि जो हमें सक्षम बनाती है कि हम जो देखते हैं उसे मात्र ऊपरी तौर पर ही नहीं समझें बल्कि उसके भीतर के रहस्यों को भी देख समझ सकें। श्रीमद्भागवद्गीता के ग्याहरवें अध्याय में हम इसी दिव्य दृष्टि को श्रीकृष्ण के विश्वरूप से देखते और समझते हैं।

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