श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 38

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 38

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌॥ ।।38।।

मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ। ।।38।।

74.समाज में व्यवस्था बनाये रखने और अनुशासन के लिए, अपराधों के नियंत्रण और व्यक्तियों के उनके गलत कर्मों के लिए दिया जाने वाला दण्ड समाज और व्यक्ति को संयमित और व्यवस्थित करता है, सो दण्ड भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।
75.विजय विवेकशील और बहुत सोच समझ कर लिए गए निर्णयों की श्रृंखला पर निर्भर करता है और इसे श्रृंखला को ही नीति कहते हैं जिसे ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति समझा जाता है।
76.जब किसी तथ्य को गुप्त रखना होता है तो उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए, सो गुप्त रखने के धारण मौन भी ईश्वरीय विभूति है।
77.ज्ञानी व्यक्ति का ईश्वरीय ज्ञान तत्व ज्ञान है जो भी ईश्वरीय विभूति है।

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