श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 37
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ ।।37।।
वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ। ।।37।।
70.विभिन्न महानुभावों जिनके जीवन चरित्र को हम सब भली भाँति जानते हैं उनका उदाहरण देकर भी समझाया गया है कि हममें कौन सी विभूतियों हो तो हम भी ईश्वरत्व की प्राप्ति के अधिकारी होंगे। दरअसल ये व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत हैं। इनका वर्णन करते हुए सबसे पहले श्रीकृष्ण का उदाहरण दिया गया है कि यदि हम भी श्रीकृष्ण के गुणों वाले हों तो हम में भी ईश्वरत्व का वास होगा।
71.उसी प्रकार यदि हमारे व्यक्तित्व में अर्जुन सदृश्य गुण हों तो वो भी ईश्वरीय विभूति की ही अभिव्यक्ति है।
72.जब आप मुनि होते हैं यानी मननशील होते हैं , चिंतन और मनन की पराकाष्ठा चाहते हैं तो फिर वेद व्यास का उदाहरण लें, वो भी ईश्वय रूप ही हैं।
73.शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु होते हुए भी महान द्रष्टा हैं , कवि हैं सो उनमें भी ईश्वरीय विभूति का ही वास है।
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