श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 36
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ।।36।।
मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ। ।।36।।
65.ईश्वर की अनुभूति हर बड़े प्रभावकारी चीज से होती है। अच्छा और बुरा दोनों ही ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं और समझाते हैं कि किस प्रक्रार बुरे के साथ बर्ताव करना चाहिए। इसी वजह से ईश्वरीय विभुतियों के संक्षिप्त वर्णन में जुए को भी जोड़ा गया है। जो चीजें इंसान को छलती हैं उनमें जुआ प्रमुख है सो उससे भी ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है। इससे ये ज्ञात होता है कि जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है तो फिर आप सबकुछ हारने लगते हैं।
66.व्यक्ति का प्रभाव उसके व्यक्तित्व को प्रसार देता है और यह प्रभाव उसके गुणों, उसकी बुद्धि और विवेक के मेल से बनता है सो व्यक्ति का प्रभाव भी व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
67.जब व्यक्ति अपने सद्गुणों को सप्रयास बढाता है तो उसे बुरे गुणों पर विजय हासिल होती है। यह विजय उसे स्वयं के दुर्गुणों और दूसरों के दुर्गुणों दोनों पर प्राप्त होती है। यह विजय भी व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति का प्रतीक ही है।
68.निश्चय ही वह गुण है जिसे अपना कर व्यक्ति अपने मार्ग पर बिना विचलित हुए चल पाता है। इसी निश्चय की वजह से वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाता है अन्यथा आधे रास्ते में ही विचलन होना तय है, मंजिल नहीं मिल सकती है निश्चय के अभाव में । सो निश्चय ईश्वरीय विभूति है।
69.सत ही वह गुण है जिसकी मात्रा जब रजो और तमो गुणों से अधिक होती है तो व्यक्ति सत्य का अन्वेषण कर पाता है और बिना माया के, बिना मोह के जीवन को जी पाता है। इसलिए सात्विक व्यक्तियों का सात्विक भाव भी ईश्वरीय विभूति है।
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