श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ ।।35।।
तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ। ।।35।।
61.ईश्वर की अभिव्यक्ति सर्वक्षेष्ठ दृश्य और अनुभूति योग्य चीजों और भावों से होती है जिनसे हमें प्रेरणा प्राप्त होती है। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यद्द्पि सभी वेद ईश्वर की ही देन हैं और सामवेद ईश्वर की स्तुति ही है परंतु सामवेद की बृहत्साम स्तुति से ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है।
62. मन्त्रों की रचना काव्य के रूप में है और विभिन्न काव्यों का गठन भिन्न भिन्न छंदों में हैं। इन छंदों में गायत्री छंद से ईश्वरीय विभूति परिलक्षित होता है।
63.पूरा वर्ष भिन्न भिन्न मासों में बंटा हुआ होता है और उन मासों में मार्गशीर्ष मास से ईश्वरीय अनुभूति मिलती है।
64.पूरे साल के भिन्न भिन्न मास में भिन्न भिन्न ऋतुएँ आती हैं यथा जाड़ा, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा ऋतु। इन ऋतुओं में बसन्त की ऋतु में न तो जाड़ा अधिक पड़ता है न ही ग्रीष्म , मौसम खुशगवार होता है और पौधों पर फूल पुष्पित होते हैं। पूरा दृश्य बहुत ही मनोरम होता है। इस वसन्त ऋतु में हमें ईश्वर की विभूति की अनुभूति होती है।
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