श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 34
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ ।।34।।
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति , श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ। ।।34।।
51. ईश्वर ही जीवन भी हैं और मृत्यु भी। मृत्यु शरीर का संसार से सभी सम्बन्धों का अंत है और यह ईश्वर प्रदत्त विभूति है जिसे हर किसी को प्राप्त होना है।
52.जीवन की उतपत्ति और जीवन में जो कुछ होता वह सब ईश्वर के कारण ही होता है, व्यक्ति निमित्त भर होता है हालांकि होने का निमित्त होना भी ईश्वरीय विभूति ही है।
53.ईश्वर का कोई लिंग नहीं होता है, वह तो हर रूप में हैं । सो ईश्वर नारी सुलभ विभूतियों के भी स्वामी हैं यथा कीर्ति , श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा। कीर्ति व्यक्ति के वो कर्म हैं जो उसे महान बनाते हैं । यह कीर्ति महान व्यक्ति की ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
55.श्री, व्यक्ति की सम्पन्नता है जो धन का पर्यावाची नहीं है। वस्तुतः श्री तो व्यक्ति की वो सम्पदा है जिससे उसे कांति प्राप्त होती है। इसमें उसके कर्म, उसके विचार, उसकी कीर्ति, और यँहा तक भी धन भी शामिल हो सकता है।यह श्री यानी उसकी सम्पदा ईश्वरीय विभूति की प्रतीक है।
56. ईश्वर की एक महान विभूति वाणी है। वाणी से व्यक्ति के विचार, उसका ज्ञान और विवेक व्यक्त होते हैं सो वाणी ईश्वरीय विभूति है।
57.व्यक्ति की स्मृतियाँ उसे आगे बढ़ने का मार्ग देती हैं। स्मृतियों के भंडार में ज्ञान संचित होता है सो स्मृति भगवान की विभूति है।
58. बुद्धि, विवेक और ज्ञान के मेल से मेघा बनती है जो व्यक्ति को मनन , चिंतन, के साथ ही चीजों को समझने की क्षमता प्रदान करता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति किसी चीज को आत्मसात करता है, अवांछित का त्याग करता है और ठीक से व्यक्त करता है। मेघा का यह गुण व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति का प्रतीक होता है।
59.धृति, यानी धैर्य जिससे व्यक्ति अपने चिंतन पथ पर दृढ़ता से कायम रहता है और यह ईश्वरीय विभूति का प्रतीक होता है।
60.क्षमा, यानी स्वयं को और अन्य को उसकी गलतियों के लिए दंडित नहीं करना और उसे अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर देना भी एक महान गुण है जो ईश्वरीय विभूति के कारण है। इस कारण व्यक्ति दम्भ, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या , हिंसा और बदला लेने वाले अवगुणों से स्वयं की रक्षा कर पाता है।
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