श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 33
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ ।।33।।
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ। ।।33।।
47.ईश्वर सभी अक्षरों में मौजूद अकार हैं अर्थात हमारी भाषा का हर अक्षर ईश्वर की विभूति से ओतप्रोत है।
48.इसी प्रकार भाषा के व्याकरण में जो द्वंद्व समास है वह भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।
इन दो उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि हम जो बोलते लिखते पढ़ते हैं वह भी ईश्वरीय विभूति की ही देन है।
49.ईश्वर काल का भी काल यानी महाकाल हैं जिनका कभी नाश नहीं होता है, बल्कि इस संसार की समस्त क्रियाएँ इस काल के ही परिपेक्ष्य में घटित होती रहती हैं परंतु काल यथावत बना रहता है।
50. ईश्वर ही सभी का कर्मफल दाता है। वह सब ओर मुख वाला है यानी समस्त दिशाएँ उसके सम्मुख ही हैं और वह भी का भरण पोषण करता है।
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