श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 32
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥ ।।32।।
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ। ।।32।।
44. ईश्वर इस सृष्टि के पहले भी थे, इस सृष्टि के दौरान भी हैं और इस सृष्टि के अंत के उपरांत भी हैं। ईश्वर समय और काल, स्थान और स्वरूप से परे हैं। इसीलिए ईश्वर ही इस सृष्टि के प्रारम्भ, मध्य और अंत के कारण हैं।
45. मनुष्य ने महान ज्ञान का अर्जन किया है और उसके ज्ञान अर्जन की कोई सीमा भी नहीं है। किंतु सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ ज्ञान स्वयं का आत्म ज्ञान है जिससे व्यक्ति यह जानने में सक्षम हो पाता है कि दरअसल वह स्वयं कौन है। इसी आत्म ज्ञान को अध्यात्म कहते हैं जो ईश्वरीय विभूति है क्योंकि उसी ज्ञान से व्यक्ति आत्म से परमात्म की यात्रा पूरी करता है।
46. व्यक्तियों के मध्य विचारों का विनिमय सम्वाद के माध्यम से होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने ज्ञान से मोह नहीं होना चाहिये, बल्कि जब व्यक्ति अपने ज्ञान, अपने विचारों का परस्पर विनिमय कर सत्य की खोज करते हैं तो यही सम्वाद ईश्वरीय विभूति होता है।
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