श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ ।।31।।
मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ। ।।31।।
40. वायु सर्वश्रेष्ठ पवित्रकारी है। साथ ही वायु जीवन दायी भी है। बिना रंग, गंध, शोर शराबे के वायु निरन्तर सभी को जीवन भी देता और साथ साथ हर अपवित्र , दुर्गन्धित माहौल को पवित्रता और शुद्धता भी प्रदान करता है। इस कारण वायु ईश्वरीय विभूति है।
41.शस्त्र उसी के लिए होता है जो शस्त्र के उपयोग में विवेक और धर्म के अनुसार निर्णय ले पाता है अन्यथा शस्त्र विनाश के कारण हो जाते हैं। इसी वजह से शस्त्र धारण करने वाले श्रीराम ही शस्त्रों के सही अधिकारी हैं जो धर्म के लिए और मानव कल्याण के लिए शस्त्र का उपयोग करते हैं। सो श्रीराम ईश्वरीय विभूति हैं।
42.ईश्वरीय विभूति भव्यता लिए हुए होती हैं और इसीलिए सभी जलचरों में मकर जिसे सबसे भव्य जलचर माना गया है वह ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
43.गंगा जीवन दायिनी है। उसके किनारे पर कई महान सभ्यताओं ने जन्म लिया। साथ ही गंगा को पवित्रता का उद्गम भी माना गया है। इसीलिए गंगा ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति हैं।
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