श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 30

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌॥ ।।30।।

मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ। ।।30।।

36.ईश्वर तो दैत्यों में भी विराजमान होते हैं ।अगर दैत्य के अंदर ईश्वरत्व के गुण हो तो दैत्य भी ईश्वर की ही वी विभूति होते हैं। इसी वजह से ईश्वर की अभिव्यक्ति दैत्यराज प्रह्लाद के माध्यम से होता है।
37. ईश्वर उन चीजों से भी व्यक्त होते हैं जो टैंजीबल नहीं होते हैं परंतु जो स्वयम में नियंत्रण की भूमिका निभाते हैं। और इसी वजह से समय जो सब कुछ का साक्षी है उससे ईश्वर की अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।
38.इसी प्रकार ईश्वर पशुओं में भी अभिव्यक्त होते हैं। पशुओं का राजा , सिंह होता है जिसकी उपस्थिति मात्र से अन्य पशुओं की उपस्थिति प्रभावित होती है और जो शक्ति का प्रतीक होता है, सो ईश्वर पशुओं के राजा सिंह से व्यक्त होते हैं।
39.पशुओं की भाँति ईश्वर अन्य जीवों जैसे पक्षियों से व्यक्त होते हैं और पक्षी राज गरुड़ से हम ईश्वरीय विभूति को पाते हैं। गरुड़ भगवान विष्णु की सवारी हैं। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति में गरुड़ की तरह की मनोदशा का प्रादुर्भाव होता है तो ईश्वर उसके माध्यम से विचरते हैं।


Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय