श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 29

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌॥ ।।29।।

मैं नागों में  शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ। ।।29।।

32. ईश्वर की अभिव्यक्ति शेषनाग में भी मिलती है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड शेषनाग के फन पर स्थिर है और शेषनाग के शरीर पर भगवान विष्णु, जो संसार के पालक हैं निश्चिन्त भाव से सोये हुए हैं। इस प्रकार शेषनाग न सिर्फ ब्रह्मांड को स्थिर रखे हुए हैं बल्कि उस ब्रह्मांड के पालक श्रीविष्णु और उनकी धर्मपत्नी, धन और सम्पदा की स्वामिनी लक्ष्मी को भी निश्चिंत भाव से आराम की मुद्रा दिए हुए हैं। विशेष यह है कि शेषनाग के फन अंदर की तरफ मुड़े हुए हैं जिससे उनकी दृष्टि भगवान पर स्थिर है। इससे हमें यह समझ मिलती है कि जब मन शांत भाव से ईश्वर  में तल्लीन होजाता है तो फिर  वह मन संसार के सारे भार को निश्चिन्त भाव से वहन कर लेता है और ऐसे मन वाले के जीवन में धन संपदा भी प्रचुर होती है। मन ईश्वर में लगा हुआ हो , वही मन शेषनाग है।
33.जीवन का आधार जल है सो ईश्वर जल के देवता वरुण से भी प्रकट होते हैं। इस प्रकार ईश्वर ही जीवन के आधार हैं।
34. ईश्वर की अभिव्यक्ति सिर्फ सजीव और निर्जीव में ही नहीं बल्कि पितरों में भी होती है और आर्यमा नामक पितर से ईश्वर अभिव्यक्त होते हैं।
35.यमों के राजा को यमराज कहते हैं जो शासक होते हैं और ईश्वर उनसे भी अभिव्यक्त होते हैं।

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