श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 28
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ ।।28।।
मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ। ।।28।।
28.वज्र को देवताओं का सबसे मजबूत शस्त्र माना जाता है। वज्र दधीचि नामक तपस्वी के अस्थियों से बनाया गया माना जाता है। तप में लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, समर्पण और उपासना निहित है और इनके मेल से बने शस्त्र हर आसुरी वृत्ति का नाश करने में सक्षम होते हैं। सो ईश्वर को शस्त्रों में वज्र माना गया है।
29.सभी कामनाओं की पूर्ति ईश्वर ही करते हैं , उन्हीं की अनुकम्पा से मनुष्य की कामनाओं की क्षुधा की तृप्ति होती है सो ईश्वर को गौओं में कामधेनु कहा गया है।
30.प्राणियों की जातियों की निरंतरता के प्रजनन अनिवार्य शर्त है और प्रजनन हेतु काम की भावना का उतपन्न होना आवश्यक है। इसीलिए ईश्वर ही काम की इक्षा को उतपन्न करने वाले कामदेव भी हैं।
31.सर्पों के राजा वासुकि हैं जिन्होंने सर्प होते हुए भी प्राणियों के कल्याणार्थ उनकी मदद ही की है सो ईश्वर को सर्पों में बासुकी के माध्यम से प्रकट माना गया है।
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