श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 25

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥

मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ। ।।25।

17. ईश्वर की उपस्थिति तो हर जगह है, फिर चाहे वो दैवी , मानवीय हो या आसुरी।  और हर कोटि के सर्वोत्तम उदाहरण से ईश्वरत्व को समझा जा सकता है। सो महान ऋषियों की परंपरा में भृगु ऋषि के माध्यम से, उनके जीवन चरित्र को समझकर हम ईश्वरत्व को समझ पाते हैं।

18.भावनाओं का उद्गार शब्दों से होता है। और सनातन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण अक्षर ॐ है जिससे ईश्वर की समझ बनती है यानी ॐ में ईश्वरीय वास है।

19.निष्काम कर्म को सम्पादित करने का मार्ग है कि व्यक्ति गया विधि से कर्म करे। कई तरह के यज्ञों में ईश्वर के नाम का स्मरण सबसे अच्छा यज्ञ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बारम्बार ईश्वरीय नाम को मन भाव से लेने से व्यक्ति स्वतः धीरे धीरे गलत कर्मों से दूर होता जाता। सो जपयज्ञ में ईश्वर ही बसते हैं

20 बहुत ऊँचा होकर भी हिमालय स्थिर है, वह अपने ही भार से विचलित होकर गिरता नहीं है सो ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।

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