श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 24
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥ ।।24।।
पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ। ।।24।।
14. जो व्यक्ति दूसरों के हित हेतु उसके बदले कर्मकांड और पूजा इत्यादि करता है वह पुरोहित कहलाता है। यँहा हित महत्वपूर्ण है। दैवी गुणों के स्वामी देवताओं का हित चाहने वाले और उसके अनुरूप कर्मकांडों को सम्पादित करने वाले गुरु वृहस्पति होते हैं। वे वृहस्पति दूसरों के हितार्थ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं सो वही ईश्वर रूप को व्यक्त करते हैं।
15.ईश्वर ही सभी सद्गुणों के स्वामी भी हैं और उनके रक्षक भी। सो वे देवताओं के सेनापति यानी दैवी गुणों के स्वामियों के स्वामी और उन दैवी सम्पदाओं के रक्षक यानी स्कंद अर्थात कार्तिकेय भी हैं।
16. जीवन का अवलम्ब जल है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्र है जो ईश्वर का स्वरूप है यानी ईश्वर ही जीवन का अवलम्ब है।साथ ही सागर अनंत सम्पदा धरोहर भी है सो वह ईश्वर को ही अभिव्यक्त करता है।
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