श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 22

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥ ।।22।।

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ। ।।22।।

6.परमात्मा ही परमात्मा की संगीतमय स्तुति हैं, सो सामवेद भी वही हैं। सामवेद सनातन परंपरा में ईश्वर की स्तुति पद्य कला में है सो श्रीकृष्ण ने ईश्वरीय विभूति को पहचानने के लिए सामवेद का उल्लेख किया है।।

7. सभी दैवी गुणों को नियंत्रित करने वाला प्रधान दैवी गुण इंद्र कहलाता है। ईश्वर इंद्र हैं यानी समस्त दैवी गुणों के प्रधान भी हैं।

8. पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में मन तो शामिल नहीं है लेकिन सभी इन्द्रियाँ नियंत्रित मन से ही होती हैं क्योंकि सभी भाव सर्वप्रथम मन में ही उठते हैं सो ईश्वर सभी इंद्रियों को नियंत्रित करने वाला मन भी है।

9.पदार्थ बीना चेतना के निर्जीव होता है। चेतना उसमें जीवन का संचार करती है। यह चेतना जो जीवन का संचार करती है वह भी ईश्वर हीं है।

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