श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ ।।20।।
हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ। ।।20।।
अर्जुन के आग्रह पर ईश्वर की विभूतियों को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जिन विभूतियों की चर्चा की है वे निम्ननवत हैं।
1.ईश्वर सभी जीवों की आत्मा हैं। हमने जाना है कि व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व उसकी चेतना से बनता है। उसकी चेतना यानी कॉन्सियसनेस उसके वास्तविक अस्तित्व का परिचायक है। बाकी जो है वह उसका अहंकार है। उस अहंकार को हटाने के बाद ही व्यक्ति अपनी चेतना से परिचित हो पाता है। और यह सभी में एक समान ही है। यही उसकी आत्मा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने ईश्वर की विभूतियों को स्पष्ट करते हुए जिस विभूति का सर्वप्रथम उल्लेख किया है वह है कि ईश्वर सभी में उसकी चेतना यानी उसके कॉन्सियनेस के रूप में मौजूद है। ईश्वर कँही और नहीं वह तो आपकी अपनी चेतना है जो आपके अंदर है। जिस समय आप अपने अहंकार को समाप्त कर लेते हैं उसी समय आप अपने ईश्वरत्व को पा लेते हैं। आप ही ईश्वर हैं। अहम ब्रह्मास्मि। लेकिन "मैं" से अपनी चेतना तक की यात्रा तभी तय कर पाते हैं जब अहम यानी अहंकार से मुक्त हो पाते हैं। किसी में कोई भेद भाव नहीं है। सभी समान हैं एक स्तर पर।
2. ईश्वर ही सभी की उतपत्ति, सभी की उपस्थिति और सभी के अंत का कारण हैं। जब कुछ भी नहीं होता है तब भी ईश्वर हैं, जब सब कुछ समाप्त हो जाता है तब भी ईश्वर हैं।
ईश्वर सभी के आदि और अंत, सभी की उपस्थिति के एकमात्र कारण हैं। ईश्वर ही सभी के स्रोत भी हैं और सभी में उपस्थित भी हैं। ईश्वर सभी का कारण है, कोई उसका नहीं।
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