श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥ ।।15।।

हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं। ।।15।।
ईश्वर ही ईश्वर को जानते हैं। ये स्वीकारोक्ति ही हमें ईश्वर की तरफ खींच कर ले जाती है। यदि किसी को जानना है तो फिर आपको उसके समीप जाना होता है, उसके सानिध्य में रहना होता है, उसके साथ अपना जीवन व्यतीत करना होता है। फिर भी आप उसको पूरी तरह से नहीं जान पाते हैं। हाँ जब आप सामीप्य की सीमा के पार वही बन जाते हैं तो आप उसको जानने लगते हैं। इसके लिए उस दूसरे को जानने का जुनून , उसके प्रति प्रेम, श्रद्धा और विश्वास होना अनिवार्य है। यही बात आपके ईश्वर को जानने के प्रयास के साथ भी लागू होती है। जब तक आप ईश्वर नहीं हो जाते तब तक आप ईश्वर को पूरी तरह जान नहीं पाते। सामीप्य से धीरे धीरे आप कुछ जानते हैं, सब नहीं। सो आप ईश्वर बनिये।
     ये कैसे होगा भला? इसके लिए सबसे पहले अपने बाहरी आवरण को हटाइये, अपने ईगो को खत्म कीजिये, अपने मैं को नष्ट कीजिये, फिर आपको अपनी आत्मा ,अपना मूल स्वरूप दिखेगा। तब उस आत्मा को जानने का कर्म कीजिये, उसके बारे में ज्ञान अर्जित कीजिये, उसके प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव रखिये और दृढ़ प्रतिज्ञ होकर निरन्तर अभ्यास कीजिये। आसुरी गुणों को समाप्त कीजिये। तब जाकर आप अपनी आत्मा को पाते हैं जो ईश्वरोये स्वरूप है। तब आप सही में जान पाते हैं कि ईश्वर ही सभी का कारण है, वही सभी का स्वामी है, वही परुषों में सर्वोत्तम है। वही नियन्ता है, सृजनकर्ता है,, वही प्रलय है।

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