श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ ।।1।।

श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा। ।।1।।

श्रीकृष्ण अर्जुन को ईश्वर की महिमा एक बार फिर से समझाने जा रहें हैं। ऐसा क्यों कि वे बार बार इस सत्य पर जोर दे रहें हैं? दरअसल हम स्वयं को तभी समझ सकते हैं जब हम ये समझें कि हम भी उसी परमपिता के अंश हैं और यह संसार भी, जो ईश्वर की योगमाया की अभिव्यक्ति है। यह संसार और खुद हमारी प्रकृति भी ईश्वरीय माया के तीन गुणों , सतगुण, रजोगुण, और तमोगुण से मिलकर बनती है। जब हम इन तीन गुणों के प्रभाव से अतीत हो जाते हैं तो ईश्वर के माया रहित रूप को समझ पाते हैं, देख पाते हैं और तब हम समझ पाते हैं कि हम वास्तव में स्वयं इस शरीर से परे सनातन आत्मा हैं जो उसी ईश्वर का एक अंश है और तब ही हम ईश्वर के सामीप्य को पा सकते हैं। इस मार्ग को संसार में चलकर ही पाया जा सकता है।
      और ईश्वर इस सत्य को उसी को समझाते हैं जो इस सत्य के प्रति मनोयोग से लगता है। चूँकि अर्जुन श्रीकृष्ण की बातों को, उनकी शिक्षाओं को मनोयोग से ग्रहण कर रहा होता है सो उसे इस सत्य से परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण पुनः एक अन्य मार्ग पकड़ते हैं जिसमें वे ईश्वर की विभूतियों को सांसारिक
उदाहरणों से समझाते हैं ताकि अर्जुन,आसानी से तादम्य स्थापित कर सके।

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