श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 परिचय

परिचय
       एक व्यक्ति का खुद के प्रति, संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण होता है, एक समझ होती है ।किन्तु ये तीनों ही दृष्टिकोण आपस में एक सिलसिलेवार तरीके से सम्बद्ध होते हैं। ईश्वर ही परम् सत्ता है जो संसार में खुद को अभिव्यक्त करता है और वही ईश्वर व्यक्ति में भी खुद को अभिव्यक्त करता है। सो जब व्यक्ति को खुद को समझना होता है तो उसे खुद के संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने सम्बन्धों को समझना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति अपना ही विस्तार इस संसार में पाता है और संसार को ईश्वर के रूप में पाता है।
    सो यह जरूरी है कि जब तक हम ईश्वर को नहीं समझते तब तक हम न तो संसार को समझते हैं , न ही खुद को।  श्रीकृष्ण अबतक विभीन्न तरीके से इस सम्बंध को समझाते आये हैं । पुनः एक बार फिर दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण इस सत्य को बताते हैं। इस बार वे इस सत्य को कुछ ऐसे उदाहरणों से समझाने का प्रयास करते हैं जिनके समीप हम खुद को पाते हैं।

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