श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10
श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10
परिचय
एक व्यक्ति का खुद के प्रति, संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण होता है, एक समझ होती है ।किन्तु ये तीनों ही दृष्टिकोण आपस में एक सिलसिलेवार तरीके से सम्बद्ध होते हैं। ईश्वर ही परम् सत्ता है जो संसार में खुद को अभिव्यक्त करता है और वही ईश्वर व्यक्ति में भी खुद को अभिव्यक्त करता है। सो जब व्यक्ति को खुद को समझना होता है तो उसे खुद के संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने सम्बन्धों को समझना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति अपना ही विस्तार इस संसार में पाता है और संसार को ईश्वर के रूप में पाता है।
सो यह जरूरी है कि जब तक हम ईश्वर को नहीं समझते तब तक हम न तो संसार को समझते हैं , न ही खुद को। श्रीकृष्ण अबतक विभीन्न तरीके से इस सम्बंध को समझाते आये हैं । पुनः एक बार फिर दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण इस सत्य को बताते हैं। इस बार वे इस सत्य को कुछ ऐसे उदाहरणों से समझाने का प्रयास करते हैं जिनके समीप हम खुद को पाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1
श्रीभगवानुवाच
भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ ।।1।।
श्री भगवान् बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा। ।।1।।
श्रीकृष्ण अर्जुन को ईश्वर की महिमा एक बार फिर से समझाने जा रहें हैं। ऐसा क्यों कि वे बार बार इस सत्य पर जोर दे रहें हैं? दरअसल हम स्वयं को तभी समझ सकते हैं जब हम ये समझें कि हम भी उसी परमपिता के अंश हैं और यह संसार भी, जो ईश्वर की योगमाया की अभिव्यक्ति है। यह संसार और खुद हमारी प्रकृति भी ईश्वरीय माया के तीन गुणों , सतगुण, रजोगुण, और तमोगुण से मिलकर बनती है। जब हम इन तीन गुणों के प्रभाव से अतीत हो जाते हैं तो ईश्वर के माया रहित रूप को समझ पाते हैं, देख पाते हैं और तब हम समझ पाते हैं कि हम वास्तव में स्वयं इस शरीर से परे सनातन आत्मा हैं जो उसी ईश्वर का एक अंश है और तब ही हम ईश्वर के सामीप्य को पा सकते हैं। इस मार्ग को संसार में चलकर ही पाया जा सकता है।
और ईश्वर इस सत्य को उसी को समझाते हैं जो इस सत्य के प्रति मनोयोग से लगता है। चूँकि अर्जुन श्रीकृष्ण की बातों को, उनकी शिक्षाओं को मनोयोग से ग्रहण कर रहा होता है सो उसे इस सत्य से परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण पुनः एक अन्य मार्ग पकड़ते हैं जिसमें वे ईश्वर की विभूतियों को सांसारिक उदाहरणों से समझाते हैं ताकि अर्जुन,आसानी से तादम्य स्थापित कर सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ ।।2।।
मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ। ।।2।।
श्रीकृष्ण ईश्वर के प्रभुत्व को स्पष्ट करते हुए समझाते हैं कि चूँकि ईश्वर ही आदि हैं सो उनकी उतपत्ति को देवता(गुण) और ऋषि(ज्ञान) भी नहीं समझ पाते हैं।
ईश्वर सभी के कारण हैं , कोई उनका कारण नहीं होता है, सो गुणों और ज्ञान की भी अपनी सीमा होती है ईश्वर को समझने की। यह सत्य ईश्वर की प्रभुता, उनकी अ upजरता और उनके अजन्मा होने के तथ्य को रेखांकित करता है। व्यक्ति को चाहिए कि वह इस आदिपुरुष की समझ को विकसित करे अपने अंदर ताकि उसे अपने मूल स्रोत का अनुभव हो सके। एक तरह से श्रीकृष्ण मनुष्यों को प्रेरित कर रहें हैं कि वह आदिपुरुष में स्वयं के अस्तित्व को खोजे। यह खोज ऐसी है जिसके परिणाम में व्यक्ति अपने ईगो को गँवा कर अपनी आत्मा को पाता है, लेकिन इसके लिए गुणों और ज्ञान का विकास ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले समझाया है इसके लिए समर्पण और भक्ति अनिवार्य है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ।।3।।
जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। ।।3।।
श्रीकृष्ण अपनी पूर्व की बात को आगे बढाते हुए कहते हैं कि ईश्वर की समझ उसी को हो पाती है जो इस सत्य को समझ पाता है कि ईश्वर का न कोई प्रारम्भ है और न ही अंत और ईश्वर ही इस संसार की हर चीज का कारण है । इससे स्पष्ट है कि ईश्वर तो सब का कारण है किंतु उसका कोई कारण नहीं होता है। यह सत्य हमें प्रेरित करता है कि हम यह समझें कि वस्तुतः इस संसार में जीव निर्जीव जो कुछ भी है उसका कारण ईश्वर ही है यानी उनमें ईश्वर ही है। ऊपरी या बाहरी भेद जो हो लेकिन बाहर के भिन्न भिन्न आवरण के अंदर सबका मूल एक ही है। इस सत्य को समझने के बाद इस संसार में घृणा करने लायक कुछ नहीं बचता है और असत्य, हिंसा, लोभ, लाभ के लिए भी कुछ नहीं रह जाता है। जब व्यक्ति के दृष्टिकोण में यह भाव आ जाता है तो फिर इसमें कुछ भी पाप नहीं रह जाता। सभी को ईश्वरीय कारण का परिणाम समझने वाला न तो कोई भेद भाव कर सकता है , न किसी से ईर्ष्या या लगाव ही बल्कि वह तो सभी में स्वयं को देखता है और स्वयं में सबको। इस एकत्व की अनुभूति उसे ईश्वर का सामीप्य देती है जिससे उसके पापकर्म समाप्त हो जाते हैं क्योंकि पाप तो ईगो का परिणाम होता है लेकिन यँहा यो ईगो ही समाप्त हो चुका होता है और ऐसे व्यक्ति के लिए तो सबकुछ आत्मामय है जो सबमें समान रूप से परम् पिता परमेश्वर का ही अंश है। ऐसे में उसे प्राप्त करने हेतु मात्र ईश्वर ही रह जाते हैं जिनको प्राप्त कर उसका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है और वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 4 एवं 5
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥ ।।4।।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ ।।5।।
निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति, - ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं। ।।4 एवम 5।।
अब प्रश्न है कि आप ईश्वर तक पहुँचेंगे कैसे। व्यक्ति का निर्माण मात्र हाड़ माँस से नहीं होता है बल्कि एक व्यक्ति विशेष की पहचान उसकी बुद्धि और सोचने समझने की क्षमता से बनती है। सोच ही व्यक्ति को परिभाषित करती है और सोच की बदौलत ही व्यक्ति अपने को अभिव्यक्त करता है।
बुद्धि का तात्पर्य विश्लेषण करनी की क्षमता है। आप किसी भी चीज को किस तरह से देखते हैं, किस प्रकार उसका विश्लेषण करते हैं , उसके सम्बन्ध में आपकी सोच आपके बुद्धि के अनुसार क्या बनती है इसी से आपके व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।
व्यक्ति की यह सोचने समझने की क्षमता ही उसे ईश्वर की तरफ ले जाती है। आपका शरीर तो सीमित है किंतु बुद्धि आपको ईश्वर तक पहँचा देती है। क्या आप हाथ से सूरज या चाँद को पकड़ सकते हैं? उत्तर सामान्य सा है कि नहीं किन्तु आप हाथ की उँगली के माध्यम से सूरज और चाँद को इंगित तो कर ही सकते हैं। बुद्धि विवेक और आपके सोचने और विशेषण करने की क्षमता यही काम करती है। और यह ईश्वरीय देन है कि आप किस तरह से किसी चीज को विशेषित करते हैं। उदाहरण स्वरूप बुद्धि , क्षमा, तप, दान, डर, अभयता,अहिंसा, समता आदि बुद्धि के अवयव ईश्वर प्रदत्त बुद्धि और विवेक हैं जो आपको हमको जिसके पास यह होती है उसे ईश्वर का मार्ग बताती है। बुद्धि से मोह और भ्रम की समाप्ति होती है। इस बुद्धि से अवगुणों का नाश होता है , ज्ञान का मार्ग मिलता है। हमें जो कुछ मिलता है अपने कर्मों के कारण ही मिलता है, फिर चाहे हो सुख हो या दुख। कर्मों के सुचारू संचालन बुद्धि से ही ही सम्भव है। आवेश, क्रोध, घृणा, लोभ जैसी सोच से किये गए कर्म हमें विचलित करते हैं। लेकिन स्वक्ष अन्तःकरण के साथ किये गए कर्म अच्छे सोच के साथ किये जाते हैं । अच्छी सोच से जो भाव बनते हैं और उनसे जो कर्म सम्पादित होते हैं उनके कारण हम ईश्वर के समीप पहुँच पाते हैं। उदाहरण स्वरूप हम समझें कि यदि कोई अत्याचार करता है तो व्यक्ति को चाहिए कि वह उस अत्याचार के विरोध में उस अत्याचार से संघर्ष करे किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उस अत्याचारी से घृणा की जाए। हमारा धर्म है कि हम अत्याचार, अनाचार का विरोध करें लेकिन बिना अत्याचारी से घृणा किये। इस साफ भाव से संघर्ष करने पर हम न तो उत्तेजित होते हैं और न ही अत्याचार से हमारी नजर हटती है बल्कि हम ज्यादा संयमित मन से अत्याचार की खिलाफत कर पाते हैं। ऐसे भाव हमें स्वयम के भीतर जाने के लिए प्रेरित करते हैं। अपनी सोच, अपने कर्मों में इन्हीं भावों को यथा क्षमा, सत्य, अहिंसा, मन और वचन पर नियंत्रण, मन की शांति, अभयता, समता, संतुष्टि, दान, यश, कीर्ति, तप को विकसित करने वाले ही व्यक्ति को ईश्वर की प्राप्ति हो पाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥ ।।6।।
सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर की इक्षा का परिणाम है। हमने पहले ही देखा है कि ईश्वर का कोई कारण नहीं होता है, बल्कि ईश्वर सब का कारण है, सो इस संसार में जो कुछ है वह ईश्वरीय कारणों से है। ईश्वर की इक्षा से ही पंचतत्व यानी आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की रचना हुई और साथ ही बुद्धि और अहंकार जन्म लिए। इन सातों को हम निरन्तर बने रहने वाले तत्वों के रूप में जानते हैं। यही सात हमारे अंदर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में विराजमान हैं। इनकी वजह से कई भाव उतपन्न होते हैं जो पुनः अन्य विभिन्न भावों का जन्म होता है। इस प्रकार सभी कुछ की उतपत्ति ईश्वर की इक्षा से हुआ है। बिना बहुत कुछ समझे इतना समझना भी काफी है कि इस सम्पूर्ण संसार का स्रोत एक ईश्वर ही है। आप समझ सकते हैं कि यदि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को हटा दिया जाए तो फिर कोई सृष्टि सम्भव नहीं है। ये चारों अंततः आते कँहा से हैं? तो इनकी उतपत्ति का मूल स्रोत एक ईश्वर ही है। सो सारी रचना ईश्वर की देन है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 7
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ।।7।।
जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ।।7।।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि हम ईश्वर की इस महानता को समझे कि ईश्वर से सभी कुछ उतपन्न होता है। जब हम ईश्वर की विभूतियों और योग क्षमता को समझ पाते हैं तो उनके प्रति मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव जन्म लेता है जो हमें दृढ़ता के साथ ईश्वर में ही स्थिर कर देता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 8
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ ।।8।।
मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत् चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान् भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं। ।।8।।
अभी तक श्रीकृष्ण द्वारा दी गई शिक्षा से हमें स्पष्ट होता है कि ईश्वर ही अनादि है, वही सब में है, हम सब में है। जरूरत है इस बात कि व्यक्ति इस सत्य को आत्मसात कर श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वर के प्रति समर्पित हों। भक्ति में आराध्य के प्रति न सिर्फ श्रद्धा होती है बल्कि आराध्य के प्रति अटूट भरोसा भी होता है, खुद का अपने आराध्य पर समर्पण भी होता है और आराध्य के प्रति कोई संशय नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है वह अपने आराध्य के प्रति उस कर्म को समर्पित कर करता है। ईश्वर के प्रति व्यक्ति की ऐसी श्रद्धा और भक्ति जिसमें व्यक्ति का हर कर्म ईश्वर के प्रति ही समर्पित होता है उसे ईश्वर के साथ एकाकार के देती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 9
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ ।।9।।
निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। ।।9।।
ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग क्या है? ईश्वर की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व की प्राप्ति नहीं है, बल्कि स्वयं के मूल स्वरूप को पाना ही ईश्वर की प्राप्ति है। निरन्तर इस अन्वेषण में लगे रहना ही वह मार्ग है जिससे हम स्वयं के माध्यम से ईश्वर को पाते हैं। जब व्यक्ति के कर्म में ईश्वर का ध्यान लगा हो, उसके भावों और मन भी ईश्वर में लगा हो, ज्ञान के स्तर पर वह ईश्वर को समझने में लगा हो और मन, कर्म, ज्ञान से होते हुए वह ईश्वर में रम जाए तो उसे ईश्वर की समझ होती है।
ईश्वर में मन लगाना आखिर है क्या? अधिकांश व्यक्ति ईश्वर की आराधना स्वयम के लाभ पूर्ति के लिए करते हैं। उनकी अपनी समस्याएँ होती हैं जिनके निदान के लिए वे ईश्वर की आराधना करते हैं। किंतु इस भाव में मन ईश्वर में नहीं लगता है। मन तो अपनी इक्षा पूर्ति के लोभ में डूबा हुआ रहता है, सो मन ईश्वर पर टिकता ही नहीं है। दरअसल जो कामनाओं से मुक्त होकर मन से ईश चिंतन करता है उसी का मन ईश्वर में रमता है।
पुनः जब ईश्वर में मन रम जाता है तो सबकुछ में ईश्वर ही दिखता है। तब व्यक्ति चर्चा में भी9 ईश्वरीय विभूतियों की ही चर्चा करता है। यह गुण उसे ईश्वर को समझने में और सहायक होता है। दूसरों के साथ विचारों के विनिमय में , दूसरों के प्रश्नों का उत्तर देने में व्यक्ति खुद को और खंगालता है, जिससे उसकी समझ और परिपक्व होती है।
इस तरह के व्यक्ति ही ईश्वर में बसते हैं यानी ऐसे ही व्यक्ति अपने ईगो और अहंकार को काट कर स्वयम के मूल स्वरूप को प्राप्त कर पाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ ।।10।।
उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।10।।
तो व्यक्ति ईश्वर को पाता कैसे है? श्रीकृष्ण इस मार्ग को कई बार बता चुके हैं। फिर बताते हैं। जो व्यक्ति तन, मन, बुद्धि, विवेक और अपने संसाधनों का उपयोग कर्मयोग के अनुसार करता है, अपने अंदर किसी प्रकार का अहंकार /ईगो नहीं पालता है और निरन्तर स्वयम के समस्त क्रियाओं को ईश्वर को समर्पित कर करता है वैसा व्यक्ति ही निरन्तर ईश्वर में लीन होता है। ऐसे व्यक्ति के चिंतन और ध्यान में हमेशा ईश्वर ही होते हैं। वह अपने समस्त कर्म ईश्वर पर न्योछावर होकर करता है। वह खुद के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याणार्थ अपने कर्म करता है। उसके अंदर कोई कामना नहीं होती है। जब कोई इक्षा न हो तो फिर ईश्वर के प्रति समर्पण मात्र ईश्वर के लिए ही होकर रह जाता है। यही व्यक्ति दरअसल ईश्वर की भक्ति करता है, क्योंकि उसका समस्त जीवन अपने ईगो के लिए नहीं बल्कि ईश्वरीय निदेशों के प्रति समर्पित होता है। भगवान ऐसे ही व्यक्ति को आत्मसात करते हैं, स्वयम में विलीन कर लेते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ।।11।।
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ। 11।।
निरन्तर ईश्वर में समर्पित हुए व्यक्ति का मन , वचन और कर्म तीनों ईश्वरीय अनुकम्पा में ही लीन होता है। ऐसा व्यक्ति अलग से पूजा पाठ आदि करता हो और उसका कल्याण होता हो, ऐसा नहीं है बल्कि वह तो निरन्तर अपने आर कर्म, हर गतिविधि में ईश्वर को ही रचाये बसाये होता है।
जब व्यक्ति का आचरण इस प्रकार से हो जाता है तो उसके अज्ञान रूपी अहंकार का अंत हो जाता है। उसे यह ज्ञान मिलता है कि उसका वास्तविक रूप वो नहीं है जिसे उसका अहम और ईगो अभिव्यक्त करते हैं, जिसमें उसके लोभ, लालच, अटैचमेंट जैसी चीजें प्रदर्शित होती हैं। बल्कि इस अवस्था में व्यक्ति अपने इस झूठे अहम से बाहर आ जाता है। उसे ज्ञान हो पाता है कि वह ईश्वर से भिन्न न था, न होगा, जब तक उसके अंदर ईश्वर के प्रति भक्तिभाव सहित समर्पण बना हुआ है। वह वही है जो उसकी आत्मा प्रदर्शित कर रही है और इस मूल रूप में वह ईश्वर का प्रतिरूप मात्र है। ऐसे में व्यक्ति परमात्मा से जुड़ जाता है और उन्ही को प्राप्त होता है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर से युक्त हो जाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से होती है क्योंकि वह उन्हीं का अंशमात्र है लेकिन इस सम्भावना को सच्चाई बनाने के लिए जरूरी है कि वह व्यक्ति अपने अहम के चोगा को उतार कर बिना किसी लोभ लालच के परम पिता परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्मों को करे , निरन्तर उन्हीं पर भक्ति और श्रद्धा से समर्पित कर सोचे और कर्म करे, आचरण करे। ऐसी स्थिति में उसके ईगो का नाश होता है और उसकी निर्मल आत्मा परमात्मा से संयुक्त हो जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 12 & 13
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥
अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं। ।।12 & 13।।
स्वयं की आत्मा के रास्ते ईश्वर की प्राप्ति और परम् सुख का मार्ग जानने के पश्चात गुरु के प्रति भक्ति उद्दात्त हो जाती है। श्रद्धा पूर्वक विश्वास के कारण मार्ग बताने वाले के प्रति अनुराग आ जाता है। तब गुरु की महत्ता समझ में आती है और उनके सम्बन्ध में और विस्तार से जानने की उत्कंठा भी जन्म लेती है।
श्रीकृष्ण द्वारा जो मार्ग बतलाया गया है अर्जुन को उसपर गहरी श्रद्धा हो जाती है। उसे समझ में आ जाता है कि ईश्वर की प्राप्ति ही परम् उद्देश्य है, उसी की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है। उसे यह भी समझ में आ जाता है कि ईश्वर ही दैवी हैं, परम् पवित्र हैं,। वे ही सभी के कारण है अर्थात देवता यानी दैवी गुण भी ईश्वर से ही निकलते हैं, वे सनातन यानी समय से परे हैं , समस्त चर-अचर और हर स्थान में व्याप्त हैं। ईश्वर के सम्बंध में इन मौलिक बातों की समझ सिर्फ ईश्वरीय ज्ञान से ही आती है जिसे महान लोग यानी ऋषि गण भी कहते हैं। ईश्वर की इन विभूतियों की समझ विकसित होने पर व्यक्ति ईश्वर की प्राप्ति के लिए यत्नशील हो उठता है। जब हमें यह ज्ञान होता है कि हमारा ईगो ही है जो हमें अपने वास्तविक रूप से पहचान करने से रोकता है तभी ईश्वरीय प्रेरणा से इनका बोध हो पाता है।
अर्जुन जब श्रीकृष्ण से उनकी विभूतियों की चर्चा कर रहें हैं तो तय है कि अर्जुन को इस घटना के घटने के पूर्व जो भ्रम था वो दूर हुआ है। आत्मा, कर्म, ज्ञान और भक्ति से सम्बंधित श्रीकृष्ण की बातें उनकी समझ में आने लगी हैं। लेकिन ये समझ इतनी परिपक्व भी नही हुई हैं कि अर्जुन कोई अंतिम निर्णय पर पहुँच सकें। दरअसल जब तक हमें चीजों की जबतक समझ नहीं होती है हम खुद को परम् ज्ञानी ही समझते हैं। किंतु जब हमारा भ्रम हटता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम कितना कुछ नहीं जानते थे। और तब गुरु यानी मार्ग निर्देशक के प्रति हमारी श्रद्धा भी बढ़ जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥ ।।14।।
हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके लीलामय (गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में इसका विस्तार देखना चाहिए) स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही। ।।14।।
गीता में जो शिक्षा दी गई है उसके अनुसरण का निदेश भी दिया गया है। शिक्षा का एक भाग श्रवण होता है यानी सुनना, जानना, और दूसरा भाग होता है उस शिक्षा का अनुसरण करना यानी जो सीखे उसपर चलें। यदि ये दोनों नहीं होते हैं तो फिर शिक्षा आधी अधूरी रह जाती है।
व्यक्ति किसी शिक्षा का अनुसरण कब करता है? जब उसे प्राप्त शिक्षा पर भरोसा हो और उसमें भक्ति हो। ये दोनों मिलकर श्रद्धा का निर्माण करते हैं। हम अनुसरण तब करते हैं जब हमें प्राप्त शिक्षा पर श्रद्धा हो।
श्रद्धा पूर्वक शिक्षा का अनुसरण ही ज्ञान देता है। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो फिर शिक्षा पर विश्वास नहीं होगा । और यदि मात्र श्रद्धा ही रह जाये और अनुसरण न हो तो अंधविश्वास का जन्म होगा।
इन्हीं कारणों से श्रीकृष्ण ने हमेशा कहा है कि वे जो कह रहे हैं उनका अनुसरण करना चाहिए। बिना अनुसरण के हमें अनुभव नहीं मिलेगा और हम अंधविश्वास का शिकार होकर अशिक्षिय ही रह जाएंगे, हमें ईश प्राप्ति का मार्ग ही नहीं मिलेगा।
अर्जुन इस बात को समझ रहा है तभी उसकी प्रारम्भिक अज्ञानता दूर हो रही है। इसीलिए उसने स्वीकार किया है कि श्रीकृष्ण के कथनों को वह सत्य मानता है यानी उनमें श्रद्धा रखता है।
उसे यह भी लगता है कि भगवान के स्वरूप को न तो देवता और न ही दानव पूरी तरह से समझ पाते हैं क्योंकि वे आंशिक शिक्षा लेकर ही रुक जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 15
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥ ।।15।।
हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत् के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं। ।।15।।
ईश्वर ही ईश्वर को जानते हैं। ये स्वीकारोक्ति ही हमें ईश्वर की तरफ खींच कर ले जाती है। यदि किसी को जानना है तो फिर आपको उसके समीप जाना होता है, उसके सानिध्य में रहना होता है, उसके साथ अपना जीवन व्यतीत करना होता है। फिर भी आप उसको पूरी तरह से नहीं जान पाते हैं। हाँ जब आप सामीप्य की सीमा के पार वही बन जाते हैं तो आप उसको जानने लगते हैं। इसके लिए उस दूसरे को जानने का जुनून , उसके प्रति प्रेम, श्रद्धा और विश्वास होना अनिवार्य है। यही बात आपके ईश्वर को जानने के प्रयास के साथ भी लागू होती है। जब तक आप ईश्वर नहीं हो जाते तब तक आप ईश्वर को पूरी तरह जान नहीं पाते। सामीप्य से धीरे धीरे आप कुछ जानते हैं, सब नहीं। सो आप ईश्वर बनिये।
ये कैसे होगा भला? इसके लिए सबसे पहले अपने बाहरी आवरण को हटाइये, अपने ईगो को खत्म कीजिये, अपने मैं को नष्ट कीजिये, फिर आपको अपनी आत्मा ,अपना मूल स्वरूप दिखेगा। तब उस आत्मा को जानने का कर्म कीजिये, उसके बारे में ज्ञान अर्जित कीजिये, उसके प्रति श्रद्धा और भक्ति भाव रखिये और दृढ़ प्रतिज्ञ होकर निरन्तर अभ्यास कीजिये। आसुरी गुणों को समाप्त कीजिये। तब जाकर आप अपनी आत्मा को पाते हैं जो ईश्वरोये स्वरूप है। तब आप सही में जान पाते हैं कि ईश्वर ही सभी का कारण है, वही सभी का स्वामी है, वही परुषों में सर्वोत्तम है। वही नियन्ता है, सृजनकर्ता है,, वही प्रलय है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥ ।।16।।
इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं। ।।16।।
ईश्वर को समझने के लिए ईश्वरीय गुणों से स्वयम को लैस करना अनिवार्य है तो फिर ईश्वर की महानता को समझना जरूरी हो जाता है। किसी भी चीज को जानने के लिए उसकी मुख्य विशेषताओं को जानना जरूरी है जिसके द्वारा उसकी विशेषता समझ में आती है। ऐसी स्थिति में जब ईश्वर को जानने के लिए ईश्वरीय गुणों से लैस, ईश्वरत्व को प्राप्त व्यक्ति से ही जानना उचित भी है। जैसे यदि आप संविधान की विशेषताओं को समझना चाहते हैं तो फिर आपको राजनीतिक शास्त्री के पास जाना होता है, यदि चिकित्सा विज्ञान को अपनाना चाहते हैं तो उसके जानकार से समझते हैं वैसे ही जब ईश्वर को समग्रता से जानने की अभिलाषा होती है तो फिर ईश्वर की ही शरण में जाना अनिवार्य है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 17 एवं 18
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥ ।।17।।
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं? ।।17।।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥ ।।18।।
हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है। ।।18।।
श्रीकृष्ण की शिक्षा को सुनकर ये तो भरोसा हो ही जाता है कि वे सभी योगों के स्वामी हैं यानी योगेश्वर हैं अर्थात योगियों के भी ऊपर हैं। उन्होंने मनुष्य के जीवन को जीने और उस जीवन के जो लक्ष्य बताए है उनको जान-सुनकर व्यक्ति के अंदर अपने लक्ष्य यानी ईश प्राप्ति की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है जो अर्जुन के साथ हो रहा है। जब हम ईश्वर की तरफ बढ़ते हैं , उनकी प्राप्ति का मार्ग पकड़ते हैं तो ये जानना भी जरूरी ही हो जाता है कि ईश्वर की वे विभूतियाँ, वे ऐश्वर्य, वे पहचान क्या हैं जिनसे हम अपने अभीष्ट की प्राप्ति को समझ सकते हैं। ईश्वर को पाने का मार्ग हमें ईश्वरत्व की तरफ ले जाता है तो ईश्वरत्व की विभूतियों से परिचय भी तो आवश्यक है। हालाँकि श्रीकृष्ण बारम्बार श्रीमद्भागवद्गीता में इसका संक्षेप में वर्णन करते आये हैं लेकिन जो जिज्ञासु और दृढ़प्रतिज्ञ पथिक है वो इतने से भला कैसे संतुष्ट होगा। उसे तो ईश्वर की सम्पूर्ण विभूतियों की समझ विस्तार से चाहिए होता है।सो इस मार्ग का पथिक ईश्वर से यही प्रार्थना करेगा कि ईश्वर उसे ईश्वरत्व की समझ, ज्ञान, और मार्ग दे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 19
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥ ।।19।।
श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है। ।।19।।
ईश्वर को समझने के लिए अनंत रास्ते हैं क्योंकि ईश्वर के लक्षणों , उनकी विभूतियों को शब्दों में बाँधना सम्भव नहीं है। किंतु ईश्वर को समझने के लिए कुछ लक्षणों को जो प्रमुख हैं उनको समझा जा सकता है। इन प्रधान विभूतियों के माध्यम से हम ईश्वरीय मार्ग पर बढ़ते हुए हम उनकी अनंत विभूतियों का अनुभव अवश्य ही कर सकते हैं। सो हम आगे देखते हैं कि ईश्वर को समझने के लिए उनके किन प्रधान विभूतोयों पर केन्द्रित होना चाहिए।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ ।।20।।
हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ। ।।20।।
अर्जुन के आग्रह पर ईश्वर की विभूतियों को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जिन विभूतियों की चर्चा की है वे निम्ननवत हैं।
1.ईश्वर सभी जीवों की आत्मा हैं। हमने जाना है कि व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व उसकी चेतना से बनता है। उसकी चेतना यानी कॉन्सियसनेस उसके वास्तविक अस्तित्व का परिचायक है। बाकी जो है वह उसका अहंकार है। उस अहंकार को हटाने के बाद ही व्यक्ति अपनी चेतना से परिचित हो पाता है। और यह सभी में एक समान ही है। यही उसकी आत्मा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने ईश्वर की विभूतियों को स्पष्ट करते हुए जिस विभूति का सर्वप्रथम उल्लेख किया है वह है कि ईश्वर सभी में उसकी चेतना यानी उसके कॉन्सियनेस के रूप में मौजूद है। ईश्वर कँही और नहीं वह तो आपकी अपनी चेतना है जो आपके अंदर है। जिस समय आप अपने अहंकार को समाप्त कर लेते हैं उसी समय आप अपने ईश्वरत्व को पा लेते हैं। आप ही ईश्वर हैं। अहम ब्रह्मास्मि। लेकिन "मैं" से अपनी चेतना तक की यात्रा तभी तय कर पाते हैं जब अहम यानी अहंकार से मुक्त हो पाते हैं। किसी में कोई भेद भाव नहीं है। सभी समान हैं एक स्तर पर।
2. ईश्वर ही सभी की उतपत्ति, सभी की उपस्थिति और सभी के अंत का कारण हैं। जब कुछ भी नहीं होता है तब भी ईश्वर हैं, जब सब कुछ समाप्त हो जाता है तब भी ईश्वर हैं।
ईश्वर सभी के आदि और अंत, सभी की उपस्थिति के एकमात्र कारण हैं। ईश्वर ही सभी के स्रोत भी हैं और सभी में उपस्थित भी हैं। ईश्वर सभी का कारण है, कोई उसका नहीं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥ ।।21।।
मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ। ।।21।।
ईश्वर की विभूतियों का वर्णन आगे बढाते हुए उन उद्धरणों को लिया गया है जिन्हें हम देखते और अनुभव करते हैं। इससे हमें खुद को ईश्वर के साथ खुद को जोड़ने में सहायता मिलता है। तो आइए, हम क्रम से इन विभूतियों को समझें।
3. विष्णु को सनातन परंपरा के अनुसार अदिति का पुत्र माना जाता है। विष्णु सर्व्यापी हैं, वे ईश्वर हैं। विष्णु यानी ईश्वर हर जगह हैं। समय, काल, स्थान से परे ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वकालिक हैं।
4. ईश्वर सूर्य भी हैं । सूर्य यानी प्रकाश का असीमित भंडार। ईश्वर की अनुभूति से व्यक्ति के जीवन का अंधकार समाप्त हो जाता है, उसे असत से सत की तरफ चलने का मार्ग दिखता है।
4.चन्द्रमा के रूप में ईश्वर शीतलता की अनुभूति देते हैं। ईश्वर की अनुभूति व्यक्ति के अंदर से क्रोध और ईर्ष्या की अग्नि को शांत कर देता है।
5. प्रधान वायु यानी मरीचि यानी प्राण। ईश्वर की अनुभूति ही हममें प्राण का संचार करती है। अन्यथा तकनीकी रूप से जीवन बने रहने पर भी जीवन प्राण पल्लवीत नहीं हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 22
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥ ।।22।।
मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात् जीवन-शक्ति हूँ। ।।22।।
6.परमात्मा ही परमात्मा की संगीतमय स्तुति हैं, सो सामवेद भी वही हैं। सामवेद सनातन परंपरा में ईश्वर की स्तुति पद्य कला में है सो श्रीकृष्ण ने ईश्वरीय विभूति को पहचानने के लिए सामवेद का उल्लेख किया है।।
7. सभी दैवी गुणों को नियंत्रित करने वाला प्रधान दैवी गुण इंद्र कहलाता है। ईश्वर इंद्र हैं यानी समस्त दैवी गुणों के प्रधान भी हैं।
8. पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में मन तो शामिल नहीं है लेकिन सभी इन्द्रियाँ नियंत्रित मन से ही होती हैं क्योंकि सभी भाव सर्वप्रथम मन में ही उठते हैं सो ईश्वर सभी इंद्रियों को नियंत्रित करने वाला मन भी है।
9.पदार्थ बीना चेतना के निर्जीव होता है। चेतना उसमें जीवन का संचार करती है। यह चेतना जो जीवन का संचार करती है वह भी ईश्वर हीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 23
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥ ।।23।।
मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ। ।।23।।
10. सनातन परंपरा में 11 रुद्र माने जाते हैं जिनका स्वरूप बड़ा भयंकर होता है। इन 11 रुद्रों में एक शंकर ईश्वर रूप हैं। शंकर विनाश के कारक होते हैं। विनाश जीवन की निरंतरता को बनाये रखने के लिए एक अनिवार्य तत्व है । विनाश से ही नए का जन्म सम्भव होता है, नई रचनात्मकता आती है। और जीवन और उसके विभिन्न आयाम और पल्लवित होते हैं।
11. ईश्वर तो सब में हैं , राक्षस और यक्ष में भी ईश्वर हैं। उनमें भी कई अच्छी चीजें हैं। राक्षसों और यक्षों के भरण पोषण की जिम्मेदारी कुबेर पर है क्योंकि धन के रक्षक तो वही हैं । ईश्वर ही कुबेर हैं क्योंकि उनके ही स्रोत से उनका और सबका पोषण होता है।
12.वसु ऋतुओं के राजा होते हैं और आठ वसुओं में प्रधान अग्नि हैं। ईश्वर स्वयं को अग्नि के माध्यम से भी व्यक्त करते हैं क्योंकि अग्नि को सारे कर्मों का साक्षी माना जाता है और मृत्यु के उपरांत शरीर को आगे की यात्रा के लिए अग्नि को ही सुपुर्द भी कर दिया जाता है।
13.पर्वतों में सुमेरु पर्वत को समस्त संसार का केंद्र मानते हैं सो पर्वतों में ईश्वर सुमेरु पर्वत से व्यक्त होते हैं। वे ही समस्त चर-अचर के केंद्र हैं सो सभी के मेरु भी वही हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 24
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥ ।।24।।
पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ। ।।24।।
14. जो व्यक्ति दूसरों के हित हेतु उसके बदले कर्मकांड और पूजा इत्यादि करता है वह पुरोहित कहलाता है। यँहा हित महत्वपूर्ण है। दैवी गुणों के स्वामी देवताओं का हित चाहने वाले और उसके अनुरूप कर्मकांडों को सम्पादित करने वाले गुरु वृहस्पति होते हैं। वे वृहस्पति दूसरों के हितार्थ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं सो वही ईश्वर रूप को व्यक्त करते हैं।
15.ईश्वर ही सभी सद्गुणों के स्वामी भी हैं और उनके रक्षक भी। सो वे देवताओं के सेनापति यानी दैवी गुणों के स्वामियों के स्वामी और उन दैवी सम्पदाओं के रक्षक यानी स्कंद अर्थात कार्तिकेय भी हैं।
16. जीवन का अवलम्ब जल है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्र है जो ईश्वर का स्वरूप है यानी ईश्वर ही जीवन का अवलम्ब है।साथ ही सागर अनंत सम्पदा धरोहर भी है सो वह ईश्वर को ही अभिव्यक्त करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 25
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ। ।।25।।
17. ईश्वर की उपस्थिति तो हर जगह है, फिर चाहे वो दैवी , मानवीय हो या आसुरी। और हर कोटि के सर्वोत्तम उदाहरण से ईश्वरत्व को समझा जा सकता है। सो महान ऋषियों की परंपरा में भृगु ऋषि के माध्यम से, उनके जीवन चरित्र को समझकर हम ईश्वरत्व को समझ पाते हैं।
18.भावनाओं का उद्गार शब्दों से होता है। और सनातन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण अक्षर ॐ है जिससे ईश्वर की समझ बनती है यानी ॐ में ईश्वरीय वास है।
19.निष्काम कर्म को सम्पादित करने का मार्ग है कि व्यक्ति गया विधि से कर्म करे। कई तरह के यज्ञों में ईश्वर के नाम का स्मरण सबसे अच्छा यज्ञ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बारम्बार ईश्वरीय नाम को मन भाव से लेने से व्यक्ति स्वतः धीरे धीरे गलत कर्मों से दूर होता जाता। सो जपयज्ञ में ईश्वर ही बसते हैं
20 बहुत ऊँचा होकर भी हिमालय स्थिर है, वह अपने ही भार से विचलित होकर गिरता नहीं है सो ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 26
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥ ।।26।।
मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ। ।।26।।
21.ईश्वर तो हर जगह हैं और हर चीज में ईश्वर हैं। ईश्वरीय अभिव्यक्ति ही ईश्वर की विभूति है, सो इसे समझाने के लिए सर्वश्रेष्ठ का उदाहरण ही उपयुक्त है। इसीलिए ईश्वर वृक्षों में भी हैं और पीपल का वृक्ष अपने गुणों के माध्यम से ईश्वरीय विभूति को दर्शाता है।
22.इसीप्रकार दैवी गुणों के ऋषि नारद हैं जो ईश्वरीय विभूति के प्रतीक हैं।
23.सभी गंधर्वों में चित्ररथ सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ईश्वर को अभिव्यक्त करता हैं।
24.सभी सिद्ध पुरुषों में यानी जिन्होंने ईश्वर को साक्षात अनुभव किया है अर्थात जिनमें ईश्वरीय गुण पूर्णता के साथ हैं उनमें ऋषि कपिल के रूप में ईश्वर अभिव्यक्त होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 27
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्।
एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥ ।।27।।
घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान। ।।27।।
25. ईश्वर पशु, पक्षी, सजीव, निर्जीव सब में हैं और सर्व श्रेष्ठ उदाहरणों से हम इस तथ्य को समझते हैं। सो अश्वों में ईश्वर उच्चैःश्रवा अश्व ईश्वरीय गुणों की अभिव्यक्ति हैं।
26. और इसी प्रकार हाथियों में ऐरावत हाथी ईश्वरीय अभिव्यक्ति है।
27. मनुष्यों में जो व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से परिपूर्ण, अन्य सभी प्राणियों का पोषण करने वाला और उनकी रक्षा करने वाला होता है अर्थात जो राजा होता है वही ईश्वरत्व से परिपूर्ण होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ ।।28।।
मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ। ।।28।।
28.वज्र को देवताओं का सबसे मजबूत शस्त्र माना जाता है। वज्र दधीचि नामक तपस्वी के अस्थियों से बनाया गया माना जाता है। तप में लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, समर्पण और उपासना निहित है और इनके मेल से बने शस्त्र हर आसुरी वृत्ति का नाश करने में सक्षम होते हैं। सो ईश्वर को शस्त्रों में वज्र माना गया है।
29.सभी कामनाओं की पूर्ति ईश्वर ही करते हैं , उन्हीं की अनुकम्पा से मनुष्य की कामनाओं की क्षुधा की तृप्ति होती है सो ईश्वर को गौओं में कामधेनु कहा गया है।
30.प्राणियों की जातियों की निरंतरता के प्रजनन अनिवार्य शर्त है और प्रजनन हेतु काम की भावना का उतपन्न होना आवश्यक है। इसीलिए ईश्वर ही काम की इक्षा को उतपन्न करने वाले कामदेव भी हैं।
31.सर्पों के राजा वासुकि हैं जिन्होंने सर्प होते हुए भी प्राणियों के कल्याणार्थ उनकी मदद ही की है सो ईश्वर को सर्पों में बासुकी के माध्यम से प्रकट माना गया है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥ ।।29।।
मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ। ।।29।।
32. ईश्वर की अभिव्यक्ति शेषनाग में भी मिलती है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड शेषनाग के फन पर स्थिर है और शेषनाग के शरीर पर भगवान विष्णु, जो संसार के पालक हैं निश्चिन्त भाव से सोये हुए हैं। इस प्रकार शेषनाग न सिर्फ ब्रह्मांड को स्थिर रखे हुए हैं बल्कि उस ब्रह्मांड के पालक श्रीविष्णु और उनकी धर्मपत्नी, धन और सम्पदा की स्वामिनी लक्ष्मी को भी निश्चिंत भाव से आराम की मुद्रा दिए हुए हैं। विशेष यह है कि शेषनाग के फन अंदर की तरफ मुड़े हुए हैं जिससे उनकी दृष्टि भगवान पर स्थिर है। इससे हमें यह समझ मिलती है कि जब मन शांत भाव से ईश्वर में तल्लीन होजाता है तो फिर वह मन संसार के सारे भार को निश्चिन्त भाव से वहन कर लेता है और ऐसे मन वाले के जीवन में धन संपदा भी प्रचुर होती है। मन ईश्वर में लगा हुआ हो , वही मन शेषनाग है।
33.जीवन का आधार जल है सो ईश्वर जल के देवता वरुण से भी प्रकट होते हैं। इस प्रकार ईश्वर ही जीवन के आधार हैं।
34. ईश्वर की अभिव्यक्ति सिर्फ सजीव और निर्जीव में ही नहीं बल्कि पितरों में भी होती है और आर्यमा नामक पितर से ईश्वर अभिव्यक्त होते हैं।
35.यमों के राजा को यमराज कहते हैं जो शासक होते हैं और ईश्वर उनसे भी अभिव्यक्त होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥ ।।30।।
मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ। ।।30।।
36.ईश्वर तो दैत्यों में भी विराजमान होते हैं ।अगर दैत्य के अंदर ईश्वरत्व के गुण हो तो दैत्य भी ईश्वर की ही वी विभूति होते हैं। इसी वजह से ईश्वर की अभिव्यक्ति दैत्यराज प्रह्लाद के माध्यम से होता है।
37. ईश्वर उन चीजों से भी व्यक्त होते हैं जो टैंजीबल नहीं होते हैं परंतु जो स्वयम में नियंत्रण की भूमिका निभाते हैं। और इसी वजह से समय जो सब कुछ का साक्षी है उससे ईश्वर की अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।
38.इसी प्रकार ईश्वर पशुओं में भी अभिव्यक्त होते हैं। पशुओं का राजा , सिंह होता है जिसकी उपस्थिति मात्र से अन्य पशुओं की उपस्थिति प्रभावित होती है और जो शक्ति का प्रतीक होता है, सो ईश्वर पशुओं के राजा सिंह से व्यक्त होते हैं।
39.पशुओं की भाँति ईश्वर अन्य जीवों जैसे पक्षियों से व्यक्त होते हैं और पक्षी राज गरुड़ से हम ईश्वरीय विभूति को पाते हैं। गरुड़ भगवान विष्णु की सवारी हैं। यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति में गरुड़ की तरह की मनोदशा का प्रादुर्भाव होता है तो ईश्वर उसके माध्यम से विचरते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ ।।31।।
मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ। ।।31।।
40. वायु सर्वश्रेष्ठ पवित्रकारी है। साथ ही वायु जीवन दायी भी है। बिना रंग, गंध, शोर शराबे के वायु निरन्तर सभी को जीवन भी देता और साथ साथ हर अपवित्र , दुर्गन्धित माहौल को पवित्रता और शुद्धता भी प्रदान करता है। इस कारण वायु ईश्वरीय विभूति है।
41.शस्त्र उसी के लिए होता है जो शस्त्र के उपयोग में विवेक और धर्म के अनुसार निर्णय ले पाता है अन्यथा शस्त्र विनाश के कारण हो जाते हैं। इसी वजह से शस्त्र धारण करने वाले श्रीराम ही शस्त्रों के सही अधिकारी हैं जो धर्म के लिए और मानव कल्याण के लिए शस्त्र का उपयोग करते हैं। सो श्रीराम ईश्वरीय विभूति हैं।
42.ईश्वरीय विभूति भव्यता लिए हुए होती हैं और इसीलिए सभी जलचरों में मकर जिसे सबसे भव्य जलचर माना गया है वह ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
43.गंगा जीवन दायिनी है। उसके किनारे पर कई महान सभ्यताओं ने जन्म लिया। साथ ही गंगा को पवित्रता का उद्गम भी माना गया है। इसीलिए गंगा ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥ ।।32।।
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ। ।।32।।
44. ईश्वर इस सृष्टि के पहले भी थे, इस सृष्टि के दौरान भी हैं और इस सृष्टि के अंत के उपरांत भी हैं। ईश्वर समय और काल, स्थान और स्वरूप से परे हैं। इसीलिए ईश्वर ही इस सृष्टि के प्रारम्भ, मध्य और अंत के कारण हैं।
45. मनुष्य ने महान ज्ञान का अर्जन किया है और उसके ज्ञान अर्जन की कोई सीमा भी नहीं है। किंतु सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ ज्ञान स्वयं का आत्म ज्ञान है जिससे व्यक्ति यह जानने में सक्षम हो पाता है कि दरअसल वह स्वयं कौन है। इसी आत्म ज्ञान को अध्यात्म कहते हैं जो ईश्वरीय विभूति है क्योंकि उसी ज्ञान से व्यक्ति आत्म से परमात्म की यात्रा पूरी करता है।
46. व्यक्तियों के मध्य विचारों का विनिमय सम्वाद के माध्यम से होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने ज्ञान से मोह नहीं होना चाहिये, बल्कि जब व्यक्ति अपने ज्ञान, अपने विचारों का परस्पर विनिमय कर सत्य की खोज करते हैं तो यही सम्वाद ईश्वरीय विभूति होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ ।।33।।
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ। ।।33।।
47.ईश्वर सभी अक्षरों में मौजूद अकार हैं अर्थात हमारी भाषा का हर अक्षर ईश्वर की विभूति से ओतप्रोत है।
48.इसी प्रकार भाषा के व्याकरण में जो द्वंद्व समास है वह भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।
इन दो उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि हम जो बोलते लिखते पढ़ते हैं वह भी ईश्वरीय विभूति की ही देन है।
49.ईश्वर काल का भी काल यानी महाकाल हैं जिनका कभी नाश नहीं होता है, बल्कि इस संसार की समस्त क्रियाएँ इस काल के ही परिपेक्ष्य में घटित होती रहती हैं परंतु काल यथावत बना रहता है।
50. ईश्वर ही सभी का कर्मफल दाता है। वह सब ओर मुख वाला है यानी समस्त दिशाएँ उसके सम्मुख ही हैं और वह भी का भरण पोषण करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ ।।34।।
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति , श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ। ।।34।।
51. ईश्वर ही जीवन भी हैं और मृत्यु भी। मृत्यु शरीर का संसार से सभी सम्बन्धों का अंत है और यह ईश्वर प्रदत्त विभूति है जिसे हर किसी को प्राप्त होना है।
52.जीवन की उतपत्ति और जीवन में जो कुछ होता वह सब ईश्वर के कारण ही होता है, व्यक्ति निमित्त भर होता है हालांकि होने का निमित्त होना भी ईश्वरीय विभूति ही है।
53.ईश्वर का कोई लिंग नहीं होता है, वह तो हर रूप में हैं । सो ईश्वर नारी सुलभ विभूतियों के भी स्वामी हैं यथा कीर्ति , श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा। कीर्ति व्यक्ति के वो कर्म हैं जो उसे महान बनाते हैं । यह कीर्ति महान व्यक्ति की ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
55.श्री, व्यक्ति की सम्पन्नता है जो धन का पर्यावाची नहीं है। वस्तुतः श्री तो व्यक्ति की वो सम्पदा है जिससे उसे कांति प्राप्त होती है। इसमें उसके कर्म, उसके विचार, उसकी कीर्ति, और यँहा तक भी धन भी शामिल हो सकता है।यह श्री यानी उसकी सम्पदा ईश्वरीय विभूति की प्रतीक है।
56. ईश्वर की एक महान विभूति वाणी है। वाणी से व्यक्ति के विचार, उसका ज्ञान और विवेक व्यक्त होते हैं सो वाणी ईश्वरीय विभूति है।
57.व्यक्ति की स्मृतियाँ उसे आगे बढ़ने का मार्ग देती हैं। स्मृतियों के भंडार में ज्ञान संचित होता है सो स्मृति भगवान की विभूति है।
58. बुद्धि, विवेक और ज्ञान के मेल से मेघा बनती है जो व्यक्ति को मनन , चिंतन, के साथ ही चीजों को समझने की क्षमता प्रदान करता है जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति किसी चीज को आत्मसात करता है, अवांछित का त्याग करता है और ठीक से व्यक्त करता है। मेघा का यह गुण व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति का प्रतीक होता है।
59.धृति, यानी धैर्य जिससे व्यक्ति अपने चिंतन पथ पर दृढ़ता से कायम रहता है और यह ईश्वरीय विभूति का प्रतीक होता है।
60.क्षमा, यानी स्वयं को और अन्य को उसकी गलतियों के लिए दंडित नहीं करना और उसे अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर देना भी एक महान गुण है जो ईश्वरीय विभूति के कारण है। इस कारण व्यक्ति दम्भ, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या , हिंसा और बदला लेने वाले अवगुणों से स्वयं की रक्षा कर पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ ।।35।।
तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ। ।।35।।
61.ईश्वर की अभिव्यक्ति सर्वक्षेष्ठ दृश्य और अनुभूति योग्य चीजों और भावों से होती है जिनसे हमें प्रेरणा प्राप्त होती है। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यद्द्पि सभी वेद ईश्वर की ही देन हैं और सामवेद ईश्वर की स्तुति ही है परंतु सामवेद की बृहत्साम स्तुति से ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है।
62. मन्त्रों की रचना काव्य के रूप में है और विभिन्न काव्यों का गठन भिन्न भिन्न छंदों में हैं। इन छंदों में गायत्री छंद से ईश्वरीय विभूति परिलक्षित होता है।
63.पूरा वर्ष भिन्न भिन्न मासों में बंटा हुआ होता है और उन मासों में मार्गशीर्ष मास से ईश्वरीय अनुभूति मिलती है।
64.पूरे साल के भिन्न भिन्न मास में भिन्न भिन्न ऋतुएँ आती हैं यथा जाड़ा, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा ऋतु। इन ऋतुओं में बसन्त की ऋतु में न तो जाड़ा अधिक पड़ता है न ही ग्रीष्म , मौसम खुशगवार होता है और पौधों पर फूल पुष्पित होते हैं। पूरा दृश्य बहुत ही मनोरम होता है। इस वसन्त ऋतु में हमें ईश्वर की विभूति की अनुभूति होती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ।।36।।
मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ। ।।36।।
65.ईश्वर की अनुभूति हर बड़े प्रभावकारी चीज से होती है। अच्छा और बुरा दोनों ही ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं और समझाते हैं कि किस प्रक्रार बुरे के साथ बर्ताव करना चाहिए। इसी वजह से ईश्वरीय विभुतियों के संक्षिप्त वर्णन में जुए को भी जोड़ा गया है। जो चीजें इंसान को छलती हैं उनमें जुआ प्रमुख है सो उससे भी ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है। इससे ये ज्ञात होता है कि जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है तो फिर आप सबकुछ हारने लगते हैं।
66.व्यक्ति का प्रभाव उसके व्यक्तित्व को प्रसार देता है और यह प्रभाव उसके गुणों, उसकी बुद्धि और विवेक के मेल से बनता है सो व्यक्ति का प्रभाव भी व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है।
67.जब व्यक्ति अपने सद्गुणों को सप्रयास बढाता है तो उसे बुरे गुणों पर विजय हासिल होती है। यह विजय उसे स्वयं के दुर्गुणों और दूसरों के दुर्गुणों दोनों पर प्राप्त होती है। यह विजय भी व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति का प्रतीक ही है।
68.निश्चय ही वह गुण है जिसे अपना कर व्यक्ति अपने मार्ग पर बिना विचलित हुए चल पाता है। इसी निश्चय की वजह से वह अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाता है अन्यथा आधे रास्ते में ही विचलन होना तय है, मंजिल नहीं मिल सकती है निश्चय के अभाव में । सो निश्चय ईश्वरीय विभूति है।
69.सत ही वह गुण है जिसकी मात्रा जब रजो और तमो गुणों से अधिक होती है तो व्यक्ति सत्य का अन्वेषण कर पाता है और बिना माया के, बिना मोह के जीवन को जी पाता है। इसलिए सात्विक व्यक्तियों का सात्विक भाव भी ईश्वरीय विभूति है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 37
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ ।।37।।
वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ। ।।37।।
70.विभिन्न महानुभावों जिनके जीवन चरित्र को हम सब भली भाँति जानते हैं उनका उदाहरण देकर भी समझाया गया है कि हममें कौन सी विभूतियों हो तो हम भी ईश्वरत्व की प्राप्ति के अधिकारी होंगे। दरअसल ये व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत हैं। इनका वर्णन करते हुए सबसे पहले श्रीकृष्ण का उदाहरण दिया गया है कि यदि हम भी श्रीकृष्ण के गुणों वाले हों तो हम में भी ईश्वरत्व का वास होगा।
71.उसी प्रकार यदि हमारे व्यक्तित्व में अर्जुन सदृश्य गुण हों तो वो भी ईश्वरीय विभूति की ही अभिव्यक्ति है।
72.जब आप मुनि होते हैं यानी मननशील होते हैं , चिंतन और मनन की पराकाष्ठा चाहते हैं तो फिर वेद व्यास का उदाहरण लें, वो भी ईश्वय रूप ही हैं।
73.शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु होते हुए भी महान द्रष्टा हैं , कवि हैं सो उनमें भी ईश्वरीय विभूति का ही वास है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥ ।।38।।
मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ। ।।38।।
74.समाज में व्यवस्था बनाये रखने और अनुशासन के लिए, अपराधों के नियंत्रण और व्यक्तियों के उनके गलत कर्मों के लिए दिया जाने वाला दण्ड समाज और व्यक्ति को संयमित और व्यवस्थित करता है, सो दण्ड भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।
75.विजय विवेकशील और बहुत सोच समझ कर लिए गए निर्णयों की श्रृंखला पर निर्भर करता है और इसे श्रृंखला को ही नीति कहते हैं जिसे ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति समझा जाता है।
76.जब किसी तथ्य को गुप्त रखना होता है तो उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए, सो गुप्त रखने के धारण मौन भी ईश्वरीय विभूति है।
77.ज्ञानी व्यक्ति का ईश्वरीय ज्ञान तत्व ज्ञान है जो भी ईश्वरीय विभूति है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥ ।।39।।
और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो। ।।39।।
78.जीवन की उत्पत्ति का स्रोत यानी बीज ईश्वर ही हैं । उनसे ही समस्त जीवन उत्पन्न होते हैं। इस स्रोत का कभी नाश नहीं होता है। सो जीवन का स्वरुप भले बदलता रहे जीवन तो हमेशा ही रहता है।
79.इस संसार में चर और अचर जो कुछ भी है वह सब ईश्वर के कारण है, उसकी विभूति है और उन सब में ईश्वर का वास है यानी ईश्वर हर जगह , हर स्वरूप में विद्यमान हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 40, 41 एवं 42
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥ ।।40।।
हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात् संक्षेप से कहा है। ।।40।।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ ।।41।।
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान। ।।41।।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥ ।।42।।
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण जगत् को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ। ।।42।।
वस्तुतः परमात्मा की विभूतियों का कोई अंत नहीं है। सो हम पूरी तरह से सभी विभूतियों को नहीं जान सकते, किन्तु इतना जरूर समझ सकते हैं कि हमारे दृश्य और अदृश्य संसार में जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है वह ईश्वरीय विभूति की ही देन है। इनको कंठस्थ करना सम्भव नहीं है सो हमें यह जानना चाहिए कि ईश्वर पूरी तरह से व्यापक है और हमारी जानकारी ईश्वर को लेकर अत्यल्प है। दरअसल हम जो देखते जानते हैं वह तो लेशमात्र ही है। यह परमात्मा के योग से सम्भव है कि उसकी विभूतियाँ हमारे समक्ष प्रदर्शित होती हैं । परमात्मा के योग शक्ति का ये संसार अति सूक्ष्म प्रदर्शन मात्र है।
उपरोक्त ढंग से जिन विभूतियों का उल्लेख किया गया है वे सांकेतिक हैं यानी उनको पकड़ कर हम अन्य विभूतियों को समझ सकते हैं। इसीलिए स्थूल और सूक्ष्म, दृश्य और अदृश्य, शब्द और भाव सभी तरह के उदाहरण दिए गए हैं ताकि जब हम परमात्मा के तरफ की यात्रा करें तो हम समझ सकें कि मार्ग में हमें जो कुछ भी मिलता है उनके माध्यम से हम स्वयम के भीतर और बाहर ईश्वर की उपस्थिति की अनुभूति को कैसे पहचान सकें। बहुतेरे ऐसे वस्तु और भाव मिलेंगे जिनका उल्लेख यँहा विभूतियों की इस सूची में नहीं है किंतु इस सूची को समझने से हम नई अनुभूत विभूतियों को भी समझ सकेंगे।
एक सरल ढंग इतना भर है कि हम महसूस करें कि जो कुछ भी है वह सब परमात्मा के ही स्वरूप की अभिव्यक्ति मात्र है सो सभी के प्रति श्रद्धावान होकर आगे की यात्रा करें।
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