श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 9

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ ।।9।।

निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। ।।9।।

       ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग क्या है? ईश्वर की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व की प्राप्ति नहीं है, बल्कि स्वयं के मूल स्वरूप को पाना ही ईश्वर की प्राप्ति है। निरन्तर इस अन्वेषण में लगे रहना ही वह मार्ग है जिससे हम स्वयं के माध्यम से ईश्वर को पाते हैं।  जब व्यक्ति के कर्म में ईश्वर का ध्यान लगा हो, उसके भावों और मन भी ईश्वर में लगा हो, ज्ञान के स्तर पर वह ईश्वर को समझने में लगा हो और मन, कर्म, ज्ञान से होते हुए वह ईश्वर में रम जाए तो उसे ईश्वर की समझ होती है। 
   ईश्वर में  मन लगाना आखिर है क्या? अधिकांश व्यक्ति ईश्वर की आराधना स्वयम के लाभ पूर्ति के लिए करते हैं। उनकी अपनी समस्याएँ होती हैं जिनके निदान के लिए वे ईश्वर की आराधना करते हैं। किंतु इस भाव में  मन ईश्वर में नहीं लगता है। मन तो अपनी इक्षा पूर्ति के लोभ में डूबा हुआ रहता है, सो मन ईश्वर पर टिकता ही नहीं है। दरअसल जो कामनाओं से मुक्त होकर मन से ईश चिंतन करता है उसी का मन ईश्वर में रमता है। 
         पुनः जब ईश्वर में मन रम जाता है तो सबकुछ में ईश्वर  ही दिखता है। तब व्यक्ति चर्चा में भी ईश्वरीय विभूतियों की ही चर्चा करता है। यह गुण उसे ईश्वर को समझने में और सहायक होता है। दूसरों के साथ विचारों के विनिमय में , दूसरों के प्रश्नों का उत्तर देने में व्यक्ति खुद को और खंगालता है, जिससे उसकी समझ और परिपक्व होती है। 
   इस तरह के व्यक्ति ही ईश्वर में बसते हैं यानी ऐसे ही व्यक्ति अपने ईगो और अहंकार को काट कर स्वयम के मूल स्वरूप को प्राप्त कर पाते हैं।

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