श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 6
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥ ।।6।।
सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर की इक्षा का परिणाम है। हमने पहले ही देखा है कि ईश्वर का कोई कारण नहीं होता है, बल्कि ईश्वर सब का कारण है, सो इस संसार में जो कुछ है वह ईश्वरीय कारणों से है। ईश्वर की इक्षा से ही पंचतत्व यानी आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की रचना हुई और साथ ही बुद्धि और अहंकार जन्म लिए। इन सातों को हम निरन्तर बने रहने वाले तत्वों के रूप में जानते हैं। यही सात हमारे अंदर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में विराजमान हैं। इनकी वजह से कई भाव उतपन्न होते हैं जो पुनः अन्य विभिन्न भावों का जन्म होता है। इस प्रकार सभी कुछ की उतपत्ति ईश्वर की इक्षा से हुआ है। बिना बहुत कुछ समझे इतना समझना भी काफी है कि इस सम्पूर्ण संसार का स्रोत एक ईश्वर ही है। आप समझ सकते हैं कि यदि मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को हटा दिया जाए तो फिर कोई सृष्टि सम्भव नहीं है। ये चारों अंततः आते कँहा से हैं? तो इनकी उतपत्ति का मूल स्रोत एक ईश्वर ही है। सो सारी रचना ईश्वर की देन है।
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