श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ।।3।।
जो मुझको अजन्मा अर्थात् वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान् ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान् पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। ।।3।।
श्रीकृष्ण अपनी पूर्व की बात को आगे बढाते हुए कहते हैं कि ईश्वर की समझ उसी को हो पाती है जो इस सत्य को समझ पाता है कि ईश्वर का न कोई प्रारम्भ है और न ही अंत और ईश्वर ही इस संसार की हर चीज का कारण है । इससे स्पष्ट है कि ईश्वर तो सब का कारण है किंतु उसका कोई कारण नहीं होता है। यह सत्य हमें प्रेरित करता है कि हम यह समझें कि वस्तुतः इस संसार में जीव निर्जीव जो कुछ भी है उसका कारण ईश्वर ही है यानी उनमें ईश्वर ही है। ऊपरी या बाहरी भेद जो हो लेकिन बाहर के भिन्न भिन्न आवरण के अंदर सबका मूल एक ही है। इस सत्य को समझने के बाद इस संसार में घृणा करने लायक कुछ नहीं बचता है और असत्य, हिंसा, लोभ, लाभ के लिए भी कुछ नहीं रह जाता है। जब व्यक्ति के दृष्टिकोण में यह भाव आ जाता है तो फिर इसमें कुछ भी पाप नहीं रह जाता। सभी को ईश्वरीय कारण का परिणाम समझने वाला न तो कोई भेद भाव कर सकता है , न किसी से ईर्ष्या या लगाव ही बल्कि वह तो सभी में स्वयं को देखता है और स्वयं में सबको। इस एकत्व की अनुभूति उसे ईश्वर का सामीप्य देती है जिससे उसके पापकर्म समाप्त हो जाते हैं क्योंकि पाप तो ईगो का परिणाम होता है लेकिन यँहा यो ईगो ही समाप्त हो चुका होता है और ऐसे व्यक्ति के लिए तो सबकुछ आत्मामय है जो सबमें समान रूप से परम् पिता परमेश्वर का ही अंश है। ऐसे में उसे प्राप्त करने हेतु मात्र ईश्वर ही रह जाते हैं जिनको प्राप्त कर उसका अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है और वह ईश्वर में ही समाहित हो जाता है।
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