श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 2
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 2
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ ।।2।।
मेरी उत्पत्ति को अर्थात् लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ। ।।2।।
श्रीकृष्ण ईश्वर के प्रभुत्व को स्पष्ट करते हुए समझाते हैं कि चूँकि ईश्वर ही आदि हैं सो उनकी उतपत्ति को देवता(गुण) और ऋषि(ज्ञान) भी नहीं समझ पाते हैं।
ईश्वर सभी के कारण हैं , कोई उनका कारण नहीं होता है, सो गुणों और ज्ञान की भी अपनी सीमा होती है ईश्वर को समझने की। यह सत्य ईश्वर की प्रभुता, उनकी अजरता और उनके अजन्मा होने के तथ्य को रेखांकित करता है। व्यक्ति को चाहिए कि वह इस आदिपुरुष की समझ को विकसित करे अपने अंदर ताकि उसे अपने मूल स्रोत का अनुभव हो सके। एक तरह से श्रीकृष्ण मनुष्यों को प्रेरित कर रहें हैं कि वह आदिपुरुष में स्वयं के अस्तित्व को खोजे। यह खोज ऐसी है जिसके परिणाम में व्यक्ति अपने ईगो को गँवा कर अपनी आत्मा को पाता है, लेकिन इसके लिए गुणों और ज्ञान का विकास ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जैसा कि श्रीकृष्ण ने पहले समझाया है इसके लिए समर्पण और भक्ति अनिवार्य है।
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