श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 17 एवं 18
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 17 एवं 18
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥ ।।17।।
हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं? ।।17।।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन।
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्॥ ।।18।।
हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात् सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है। ।।18।।
श्रीकृष्ण की शिक्षा को सुनकर ये तो भरोसा हो ही जाता है कि वे सभी योगों के स्वामी हैं यानी योगेश्वर हैं अर्थात योगियों के भी ऊपर हैं। उन्होंने मनुष्य के जीवन को जीने और उस जीवन के जो लक्ष्य बताए है उनको जान-सुनकर व्यक्ति के अंदर अपने लक्ष्य यानी ईश प्राप्ति की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है जो अर्जुन के साथ हो रहा है। जब हम ईश्वर की तरफ बढ़ते हैं , उनकी प्राप्ति का मार्ग पकड़ते हैं तो ये जानना भी जरूरी ही हो जाता है कि ईश्वर की वे विभूतियाँ, वे ऐश्वर्य, वे पहचान क्या हैं जिनसे हम अपने अभीष्ट की प्राप्ति को समझ सकते हैं। ईश्वर को पाने का मार्ग हमें ईश्वरत्व की तरफ ले जाता है तो ईश्वरत्व की विभूतियों से परिचय भी तो आवश्यक है। हालाँकि श्रीकृष्ण बारम्बार श्रीमद्भागवद्गीता में इसका संक्षेप में वर्णन करते आये हैं लेकिन जो जिज्ञासु और दृढ़प्रतिज्ञ पथिक है वो इतने से भला कैसे संतुष्ट होगा। उसे तो ईश्वर की सम्पूर्ण विभूतियों की समझ विस्तार से चाहिए होता है।सो इस मार्ग का पथिक ईश्वर से यही प्रार्थना करेगा कि ईश्वर उसे ईश्वरत्व की समझ, ज्ञान, और मार्ग दे।
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