श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 16
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥ ।।16।।
इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं। ।।16।।
ईश्वर को समझने के लिए ईश्वरीय गुणों से स्वयम को लैस करना अनिवार्य है तो फिर ईश्वर की महानता को समझना जरूरी हो जाता है। किसी भी चीज को जानने के लिए उसकी मुख्य विशेषताओं को जानना जरूरी है जिसके द्वारा उसकी विशेषता समझ में आती है। ऐसी स्थिति में जब ईश्वर को जानने के लिए ईश्वरीय गुणों से लैस, ईश्वरत्व को प्राप्त व्यक्ति से ही जानना उचित भी है। जैसे यदि आप संविधान की विशेषताओं को समझना चाहते हैं तो फिर आपको राजनीतिक शास्त्री के पास जाना होता है, यदि चिकित्सा विज्ञान को अपनाना चाहते हैं तो उसके जानकार से समझते हैं वैसे ही जब ईश्वर को समग्रता से जानने की अभिलाषा होती है तो फिर ईश्वर की ही शरण में जाना अनिवार्य है।
Comments
Post a Comment