श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 14
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥ ।।14।।
हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपके लीलामय (गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में इसका विस्तार देखना चाहिए) स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही। ।।14।।
गीता में जो शिक्षा दी गई है उसके अनुसरण का निदेश भी दिया गया है। शिक्षा का एक भाग श्रवण होता है यानी सुनना, जानना, और दूसरा भाग होता है उस शिक्षा का अनुसरण करना यानी जो सीखे उसपर चलें। यदि ये दोनों नहीं होते हैं तो फिर शिक्षा आधी अधूरी रह जाती है।
व्यक्ति किसी शिक्षा का अनुसरण कब करता है? जब उसे प्राप्त शिक्षा पर भरोसा हो और उसमें भक्ति हो। ये दोनों मिलकर श्रद्धा का निर्माण करते हैं। हम अनुसरण तब करते हैं जब हमें प्राप्त शिक्षा पर श्रद्धा हो।
श्रद्धा पूर्वक शिक्षा का अनुसरण ही ज्ञान देता है। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो फिर शिक्षा पर विश्वास नहीं होगा । और यदि मात्र श्रद्धा ही रह जाये और अनुसरण न हो तो अंधविश्वास का जन्म होगा।
इन्हीं कारणों से श्रीकृष्ण ने हमेशा कहा है कि वे जो कह रहे हैं उनका अनुसरण करना चाहिए। बिना अनुसरण के हमें अनुभव नहीं मिलेगा और हम अंधविश्वास का शिकार होकर अशिक्षिय ही रह जाएंगे, हमें ईश प्राप्ति का मार्ग ही नहीं मिलेगा।
अर्जुन इस बात को समझ रहा है तभी उसकी प्रारम्भिक अज्ञानता दूर हो रही है। इसीलिए उसने स्वीकार किया है कि श्रीकृष्ण के कथनों को वह सत्य मानता है यानी उनमें श्रद्धा रखता है।
उसे यह भी लगता है कि भगवान के स्वरूप को न तो देवता और न ही दानव पूरी तरह से समझ पाते हैं क्योंकि वे आंशिक शिक्षा लेकर ही रुक जाते हैं।
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