श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 11
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 11
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ।।11।।
हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ। 11।।
निरन्तर ईश्वर में समर्पित हुए व्यक्ति का मन , वचन और कर्म तीनों ईश्वरीय अनुकम्पा में ही लीन होता है। ऐसा व्यक्ति अलग से पूजा पाठ आदि करता हो और उसका कल्याण होता हो, ऐसा नहीं है बल्कि वह तो निरन्तर अपने आर कर्म, हर गतिविधि में ईश्वर को ही रचाये बसाये होता है।
जब व्यक्ति का आचरण इस प्रकार से हो जाता है तो उसके अज्ञान रूपी अहंकार का अंत हो जाता है। उसे यह ज्ञान मिलता है कि उसका वास्तविक रूप वो नहीं है जिसे उसका अहम और ईगो अभिव्यक्त करते हैं, जिसमें उसके लोभ, लालच, अटैचमेंट जैसी चीजें प्रदर्शित होती हैं। बल्कि इस अवस्था में व्यक्ति अपने इस झूठे अहम से बाहर आ जाता है। उसे ज्ञान हो पाता है कि वह ईश्वर से भिन्न न था, न होगा, जब तक उसके अंदर ईश्वर के प्रति भक्तिभाव सहित समर्पण बना हुआ है। वह वही है जो उसकी आत्मा प्रदर्शित कर रही है और इस मूल रूप में वह ईश्वर का प्रतिरूप मात्र है। ऐसे में व्यक्ति परमात्मा से जुड़ जाता है और उन्ही को प्राप्त होता है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर से युक्त हो जाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से होती है क्योंकि वह उन्हीं का अंशमात्र है लेकिन इस सम्भावना को सच्चाई बनाने के लिए जरूरी है कि वह व्यक्ति अपने अहम के चोगा को उतार कर बिना किसी लोभ लालच के परम पिता परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्मों को करे , निरन्तर उन्हीं पर भक्ति और श्रद्धा से समर्पित कर सोचे और कर्म करे, आचरण करे। ऐसी स्थिति में उसके ईगो का नाश होता है और उसकी निर्मल आत्मा परमात्मा से संयुक्त हो जाती है। यदि हम इस भाव से जीवन को जीते हैं तो स्वयम प्रभु इसे हमारे अन्तःकरण में अवस्थिय होकर इसे सम्भव करते हैं। दरअसल जब आप सन्मार्ग पर चलते हैं , उसी के अनुरूप अपना आचरण करते हैं तो ईश्वर ही आपके मार्गदर्शक बन जाते हैं। आपमें दृढ़ इक्षाशक्ति, समर्पण, श्रद्धा और भक्ति भर होनी चाहिए, मार्ग तो ईश्वर स्वयम ही आपको दे देंगे।
Comments
Post a Comment