श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 10

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌।
ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ ।।10।।

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।10।।

    तो  व्यक्ति ईश्वर को पाता कैसे है? श्रीकृष्ण इस मार्ग को कई बार बता चुके हैं। फिर बताते हैं। जो व्यक्ति तन, मन, बुद्धि, विवेक और अपने संसाधनों का उपयोग कर्मयोग के अनुसार करता है, अपने अंदर किसी प्रकार का अहंकार /ईगो नहीं पालता है और निरन्तर स्वयम के समस्त क्रियाओं को ईश्वर को समर्पित कर करता है वैसा व्यक्ति  ही निरन्तर ईश्वर में लीन होता है। ऐसे  व्यक्ति के चिंतन और ध्यान में हमेशा ईश्वर ही होते हैं। वह  अपने समस्त कर्म ईश्वर पर न्योछावर होकर करता है। वह खुद के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याणार्थ अपने कर्म करता है। उसके अंदर कोई कामना नहीं होती है। जब कोई इक्षा न हो तो फिर ईश्वर के प्रति समर्पण मात्र ईश्वर के लिए ही होकर रह जाता है। यही व्यक्ति दरअसल ईश्वर की भक्ति करता है, क्योंकि उसका समस्त जीवन अपने ईगो के लिए नहीं बल्कि ईश्वरीय निदेशों के प्रति समर्पित होता है। भगवान ऐसे ही व्यक्ति को आत्मसात करते हैं, स्वयम में विलीन कर लेते हैं।

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