श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ ।।26।।
जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ। ।।26।।
ईश्वर के प्रति भक्ति का स्वरूप क्या है, इसे समझना आवश्यक है। श्रद्धा और प्रेम पूर्वक समर्पण ही भक्ति है। हम सब अपने जीवन में कई तरह के क्रिया कलाप करते रहते हैं जो मुख्यतः हमारी कामनाओं की पूर्ति के लिए होते हैं। हम अपनी कामनाओं की पूर्ति हेतु लगे होते हैं क्योंकि इससे हमारा अहम यानी हमारा ईगो सन्तुष्ट होता है। ऐसी अवस्था में हमारे कर्म हमी को समर्पित होकर रह जाते हैं। किंतु जब हम अपनी कामनाओं के दायरे से बाहर निकलते हैं तो हमारा ईगो समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में हम जो कुछ करते हैं वह हम अपने लिए करते ही नहीं हैं। हम जो कुछ करते हैं वह इस भाव और इस समझ के साथ करते हैं कि सब कुछ परम् पिता परमेश्वर का ही है। उसी की इक्षा और उसी की आज्ञा से हम उनका उपभोग कर रहे हैं सो हम अपने कर्मों को उन्हीं को समर्पित करते हैं। इस भाव और समझ के साथ किया गया कर्म ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित होता है, उसमें रत्ती भर भी स्वार्थ नहीं होता है, उसमें रत्ती भर भी अपना ईगो नहीं होता है।
और जब इस भक्ति भाव के समर्पण के साथ कुछ भी करते हैं ईश्वर उनको स्वीकार कर लेते हैं । समर्पण के साथ किये गए कर्म में हमारा ईगो नहीं होता है। वैसी स्थिति में हमारा अस्तित्व ईश्वर के साथ एकीकृत होने लगता है क्योंकि भक्ति के साथ किये गए समर्पण में व्यक्ति खुद से निकलकर ईश्वर में विलीन होने लगता है। उसके कर्म परम् पिता परमेश्वर को लक्षित कर, उनको ही समर्पित होकर किये जाते हैं और परमेश्वर के द्वारा उनको स्वीकार भी किया जाता है। तब व्यक्ति और ईश्वर के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
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