श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 25

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌॥ ।।25।।

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता (गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में देखना चाहिए)। ।।25।।

प्रत्येक कर्म का अपना फल होता है जो व्यक्ति के कर्मों के अनुसार उनको प्राप्त होते हैं। जैसी आपकी श्रद्धा होती है वैसे ही आपको फल भी प्राप्त होते हैं। इसी के अनुरूप हमारे उपासना के भी परिणाम प्राप्त होते हैं। जब हमारे कर्म सकाम होते हैं हम किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति की कामना करते हैं। यदि हमारी श्रद्धा और कर्म उस उद्देश्य की पूर्ति परम्  अनुरूप होते हों तो हमें उनकी प्राप्ति होती है, किन्तु जब व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करते हैं हमारी श्रद्धा उस परमात्मा के प्रति होती है जो सबका नियन्ता और प्रभु है और तदनुरूप हमें उस परमात्मा की प्राप्ति होती है। जब कोई इक्षा और कामना ही नहीं होती हो तब कोई बंधन भी नहीं होता है और उस बन्धन में बंधने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। इसके लिए निष्काम कर्म, यज्ञ भाव, ज्ञान और समर्पण की आवश्यकता होती है। तब जीवन में कोई बंधन नहीं रह जाता है। कर्म करते हुए व्यक्ति को उस परम भाव की प्राप्ति होती है जो अंतिम रूप से सभी का प्रभु है।

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