श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 9

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥ ।।9।।

हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तृत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते हैं उसका नाम 'उदासीन के सदृश' है।) स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते हैं। ।।9।।

सूर्य की रौशनी से सभी प्रकाशित होते हैं। सूर्य के उदय के साथ जो भी सूर्य की परिधि में आता है प्रकाशित होता ही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सूर्य द्वारा दूसरों को प्रकाशित किया जाना, सूर्य का प्रयास सहित किया गया कर्म नहीं है बल्कि यह सूर्य की स्वाभाविक प्रकृति है। इस एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि संसार का नियमित संचालन, जन्म, पालन और मृत्यु के चक्र को चलाते रहना , ये ईश्वर के द्वारा  किसी उद्देश्यपूर्वक , किसी स्वार्थ वश किये जाने वाले कर्म नहीं हैं बल्कि यह ईश्वर की प्रकृति का ही हिस्सा हैं। और इसी कारण इन कर्मों को करने के बावजूद ईश्वर को न तो कर्म बाँध पाते हैं और न ही कर्मफल। यही कर्मयोग की शिक्षा भी हमें समझाती है कि जब आप कर्म करें तो कर्मफल से बन्धें नहीं, बल्कि आपके कर्म स्वाभाविक रूप से होने चाहिए।

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