श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 23
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 23
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥ ।।23।।
हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है। ।।23।।
जब व्यक्ति के अंदर इक्षाएँ बलवती होती हैं तो वह उनकी पूर्ति के लिये तरह तरह के उपाय भी करता है । एक आस्थावान व्यक्ति अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु बिना योग को पूरी तरह समझे लेकिन योग के आचरण का प्रयास करता हुआ प्रयत्नशील होता है तो वह अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु भिन्न भिन्न देवी देवताओं की शरण में जाता है। वह परम पिता परमेश्वर में निष्काम भाव से लीन न होकर सकाम भाव से कर्मकांडों को करता हुआ विभिन्न देवी देवताओं की पूजा करता है। यह समर्पण उस व्यक्ति को उस परम पिता परमेश्वर से तो नहीं मिला पाता किन्तु उसके सकाम कर्म उसे फल अवश्य देते हैं।
यह सही है कि भिन्न भिन्न देवी देवता परम् ईश्वर के ही भिन्न भिन्न ऐश्वर्य के प्रतिनिधि हैं किंतु वे सम्पूर्ण परमात्मा तो हैं नहीं। जैसे आँखों से देखा जा सकता है, जिह्वा से बोला जा सकता है , नासिका से सूँघा जा सकता है , कानों से सुना जा सकता है,आदि आदि किन्तु ये अलग अलग अंग अलग अलग कर्म करते हुए भी एक व्यक्ति की सम्पूर्ण पहचान नहीं होते उसी प्रकार अलग अलग देवी देवता व्यक्ति के अलग अलग इक्षाओं की पूर्ति तो कर सकते हैं किंतु वे उस व्यक्ति को परमात्मा का सम्पूर्ण परिचय नहीं दे पाते हैं। हमें अंग्रेजी की वो कहावत ध्यान में रखनी चाहिए कि whole is better than sum of total. ईश्वर को समझने का यह तरीका व्यक्ति को ईश्वर के करीब नहीं ले जाता है क्योंकि एक सकामी व्यक्ति अपनी इक्षा पूर्ति में ही भिन्न भिन्न देवी देवताओं में भटक कर रह जाता है।
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