श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 20, 21
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 20, 21
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ ।।20।।
तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं। ।।20।।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥ ।।21।।
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात् पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं। ।।21।।
कर्मयोग, भक्तियोग(उपासना) और ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले का क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर उस व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। जब व्यक्ति धर्म के तीनों चरण को निष्ठा पूर्वक मानता है , वह कर्मयोग , भक्तियोग और ज्ञानयोग में क्रमशः आस्था रखता हुआ जीवन जीता है तो भी यह सम्भव है कि वह अपने कर्मयोग और उपासना के मार्ग में निष्काम नहीं बना रहे बल्कि अपने उत्थान, अपने हित को ध्यान में रखकर आचरण करे और ज्ञानयोग की शिक्षा को भी अपने लाभ हेतु ही समझे। इस सकाम भाव से कर्म और भक्ति का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति को उसका लाभ सांसारिक उपलब्धियों के रूप में मिलता है यानी उसका जीवन भौतिक रूप से ज्यादा ऐश्वर्यशाली हो जाता है। उसे अंतिम मुक्ति तो नहीं मिलती फिर भी उसके जीवन में सांसारिक सुखों और ऐश्वर्य की कमी नहीं होती है।
अगर इसी बात को हम उलट कर समझें तो समझना होगा कि यदि कोई व्यक्ति मोक्ष की कामना नहीं कर ऐश्वर्य और सुख की भी कामना करता है तो भी उसका आचरण सही होना चाहिए । आसुरी गुणों से युक्त आचरण करने वाले व्यक्ति को यह स्वर्ग तुल्य सुख और ऐश्वर्य भी नहीं मिल पाता है। आचरण में कर्म के प्रति योगयुक्त प्रवीणता, यज्ञभाव और इष्ट के प्रति, लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण और इष्ट के स्वरूप का ज्ञान तो इस भौतिक सुख के लिए भी अनिवार्य है वर्ना आसुरी गुणों से प्राप्त ऐश्वर्य तो कष्ट ही देते हैं।
किन्तु जब ये कर्म बिना अपने लक्ष्य, बिना अपने इष्ट के प्रति प्रेम और समर्पण रखे सिर्फ लाभ के लिए किए जाते हैं तो लाभ तो मिलता है लेकिन कर्म का प्रभाव खत्म होना ही होता है और वह खत्म होता भी है और फिर व्यक्ति अपने पुराने प्रारम्भिक विंदु पर पहुँच जाता है। सकाम कर्म का जिसमें इक्षाएँ रची बसी होती हैं उनका अगर अच्छा परिणाम मिलता भी है तो वह सांसारिक ही होता है, उससे व्यक्ति की यात्रा खत्म नहीं होती और ये परिणाम भी सीमित समय के लिए ही होते हैं।
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