श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 19
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 19
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ ।।19।।
मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ। ।।19।।
श्रीकृष्ण इस बात पर बार बार बल देते हैं कि इस संसार में जो कुछ है, वह सब ईश्वर का ही रूप है और इसी बात को समझाने के क्रम में परमात्मा को ग्राह्य करने हेतु वे उन उदाहरणों को देते हैं जिनको हम अपने इन्द्रियों से अनुभव कर पाते हैं। इसी क्रम में हम ये तथ्य उदाहरण के द्वारा समझते हैं कि सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा, वर्षा, यँहा तक कि जीवन और मृत्यु, सत और असत, प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी कुछ ईश्वर ही हैं। कोई दूसरा नहीं होता है जिसके कारण में ईश्वर न हो। ये समझ हमें सभी चीजों और भावों में समान भाव से बनाये रखती है क्योंकि हम जँहा भी हैं, यंहा तक कि देहावसान में भी ईश्वर के ही साथ हैं।
इस प्रकार हमें ये शिक्षा मिलती है कि इस संसार में भेद करने लायक कुछ भी नहीं है क्योंकि सभी कुछ ईश्वरमय ही तो है, हम सभी उसी के प्रतिरूप तो हैं सो हमारा हर आचरण दैवी सम्पदा से पूर्ण हो इसका ध्यान रखना हमारा परम् कर्तव्य बन जाता है।
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