श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ ।।17।।

इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, (गीता अध्याय 13 श्लोक 12 से 17 तक में देखना चाहिए) पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। ।।17।।

ईश्वर की प्रकृति को समझें कि ईश्वर का कोई कारण नहीं  है लेकिन ईश्वर इस जगत के कारण हैं। ईश्वर ही पुरुष और प्रकृति दोनों है। इस सम्पूर्ण संसार के होने के पीछे समस्त पिता और समस्त माता एक ईश्वर ही है, जिसका कोई माता या पिता नहीं होते। सो संसार के पितामह भी एक ईश्वर ही हैं। इस प्रकार ईश्वर ही सब कुछ के कारण हैं।
     ईश्वर ही धाता भी हैं अर्थात ईश्वर इस संसार के होने के कारण मात्र ही नहीं होते हैं बल्कि इसके भरण पोषण के भी उत्तरदायी हैं और कर्मों के फलदाता भी हैं। प्रत्येक की आवश्यकता और प्रत्येक के कर्मों के फलदाता भी हैं।
     इस संसार में जो जानने योग्य है अर्थात जो वेद है  वह भी परम ईश्वर हीं हैं और उन वेदों को जानने हेतु आवश्यक ज्ञान यानी ॐ भी वही हैं।
      सारांशतः हम समझें कि ईश्वर ही स्वयं का कारण हैं, वही इस संसार की उतपत्ति , उसके भरण-पोषण, उसके ज्ञान और संस्कार को देने वाले भी हैं और वही एकमात्र जानने योग्य भी हैं और जानने के मार्ग यानी ॐ भी वही हैं।

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