श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 15

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।। ।।15।।

दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।।15।।

ईश्वर की उपासना के कई तरीके होते हैं । सर्वश्रेष्ठ तरीका है ईश्वर को जानना यानी ईश्वर की अनुभूति अपनी समझ , अपनी बुद्धि, अपनी भावना से करना। इस तरीके से व्यक्ति अपनी मूर्खता का, अपनी अज्ञानता का हवन कर ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझता है। यही ज्ञान यज्ञ है। 
      कई अन्य व्यक्ति भी होते हैं जो ईश्वर को विभिन्न स्वरूप के देवी-देवताओं के रूप में उपासते हैं लेकिन उनके अंदर भी यह समझ होती है कि सभी स्वरूप ईश्वर के ही प्रतिरूप हैं, कोई भेद नहीं है।
      कुछ अन्य ऐसे भी होते हैं जो सम्पूर्ण जगत में सबकुछ में ईश्वर को ही पाते हैं। उनकी समझ इस स्तर की होती है कि वे सभी को ईश्वर का ही प्रतिरूप मान कर किसी से  भी कोई भेद नहीं करते हैं।
  

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