श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 12

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ ।।12।।

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को (जिसको आसुरी संपदा के नाम से विस्तारपूर्वक भगवान ने गीता अध्याय 16 श्लोक 4 तथा श्लोक 7 से 21 तक में कहा है) ही धारण किए रहते हैं। ।।12।।

जिन लोगों को ईश्वर के वास्तविक चेतना का और इस प्रकार स्वयम के परम चेतना का ज्ञान नहीं होता है वे लोग व्यर्थ के प्रयासों में जीवन व्यतीत कर देते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष दो विकल्प होते हैं , पहला आसुरी गुणों को अपनाने का और दूसरा दैवी गुणों को अपनाने का। ईश्वरीय चेतना से रहित व्यक्ति आसुरी गुणों की शरण में जाता है। इस स्थिति में वह अत्याचारी, अहंकारी, असत्यभाषन करने वाला होता है और भ्रम और मोह के जाल में उलझा हुआ होता है। ऐसे लोग जो भी ज्ञान अर्जित करते हैं वे सब निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि उनका ज्ञान किसी की अच्छाई के लिए नहीं होता है। उनके सारे कर्म भी इसी दिशा में संचालित होकर व्यर्थ होते हैं। और ऐसे व्यक्ति जो उम्मीद पालते हैं वे उम्मीद भी निरर्थक ही होते हैं। बिना ईश्वरीय चेतना और बिना  स्वयम के परम चेतना को जाने समझे व्यक्ति आसुरी गुणों से ओत प्रोत जीवन पर्यंत निरर्थक के प्रयास में लगा हुआ रह जाता है, निरन्तर माया, मोह में उलझा काम, क्रोध, ईर्ष्या, जलन, अत्याचार, अनाचार, असत्य, हिंसा में लिप्त हुआ रह जाता है। वह मात्र और मात्र भ्रम में ही जीता रह जाता है।

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