श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 11
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 11
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ ।।11।।
मेरे परमभाव को जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं। ।।11।।
ईश्वर संसार के जन्मदाता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं और संसार उनकी परा और अपरा प्रकृति यानी भौतिक प्रकृति और सर्वश्रेष्ठ चेतना से संचालित होती है। किंतु संसार में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जिनको इस सत्य का ज्ञान नहीं हो पाता है। ऐसे लोग भौतिक प्रकृती को ही अंतिम सत्य मान कर जीते हैं सो हमेशा तुक्ष लाभों, लोभों , क्षुधा, ईर्ष्या, आदि की पूर्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान कर चलते हैं और सो हमेशा परम् चेतना की अनुभूति से दूर ही रह जाते हैं। वस्तुतः प्रतेक व्यक्ति के अंदर वह चेतना सुप्त अवस्था में अज्ञानता के आवरण से ढँकी हुई होती है। जो लोग इस आवरण को हटा पाने में सक्षम नहीं हो पाते वे लोग स्वयम के ईश्वरत्व से वंचित होकर जीवन पर्यंत अनाचार, असत्य, हिंसा, लोभ, लालच, ईर्ष्या आदि में डूबे रह जाते हैं और ईश्वर को भी अपनी तरह ही समझ लेते हैं।
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