श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 10

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ ।।10।।

हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है। ।।10।।

प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनती है, तमोंगुण, रजोगुण और सत्वगुण। तमोगुण आवरण का प्रतीक है तो रजोगुण भ्रम का। सत्वगुण इन आवरण और भ्रम को हटाकर सत्य का ज्ञान देता है। ईश्वर की प्रकृति में इन तीनों गुणों का समावेश होता है, जिनसे इस संसार के समस्त चर और अचर की उतपत्ति होती है, उनका पोषण होता है और फिर विनाश। और फिर से ये चक्र चलता रहता है। ईश्वर स्वयम कुछ भी नहीं करता हस बल्कि उसकी परा प्रकृति ये सब करती है और ईश्वर मात्र द्रष्टा बनकर, साक्षी बनकर इन परिवर्तनों को होते देखता है। किंतु उसकी उपस्थिति इनके होते रहने के लिए अनिवार्य है। इसे आप सरल तरह से कंप्यूटर के उदाहरण से समझ सकते हैं। कंप्यूटर अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के द्वारा अपने कार्यों को करता है। लेकिन ये सभी तभी तक कार्य करते हैं जब तक विद्युत की उपस्थिति बनी रहती है। विद्युत आपूर्ति बंद होते ये सारे कार्य बंद हो जाते हैं। विद्युत स्वयम कुछ नहीं करता है किंतु उसकी उपस्थिति कंप्यूटर द्वारा कुछ भी किये जाने के लिए अनिवार्य है। इसीप्रकार ईश्वर स्वयम कुछ नहीं करता है किंतु संसार के संचालन के लिए उसका होना ही पर्याप्त है। ईश्वर परम् चेतना है। मनुष्य और ईश्वर में इसका कोई भेद नहीं होता है। मनुष्य जब तक तमोगुण और रजोगुण के अधीन होता है उसे लगता है वही सब कुछ कर रहा है। किंतु जैसे जैसे उसपर से इन दो गुणों का प्रभाव कम होते जाता है और वह सत्वगुण के ज्यादा समीप आते जाता है उसे ज्ञात होते जाता है कि यह तो उसकी चेतना है जो द्रष्टा है । वास्तव में तो कर्ता उसकी प्रकृति है जिससे उसे पार पाना है। सो ईश्वर का सामीप्य उसे परम् चेतना के सामीप्य से ही मिलता है जो सत्वगुण के अधीन होकर ही मिल पाता है।

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