श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 7 एवम 8
श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 7 एवम 8
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥ ।।7।।
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ। ।।7।।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥ ।।8।।
अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ। ।।8।।
इस तरह से स्पष्ट है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर में सभी की उत्पत्ति और सृष्टि के अंत में उनके सभी के अंत का कारण है। सभी उसी से निकलते हैं और पुनः अंत में उसी परम् ईश्वर में विलीन हो जाते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।
ईश्वर बारम्बार इस जगत की रचना करते हैं। बारम्बार जीव उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म की अपरा प्रकृति यानी माया से जगत की बारम्बारता बनी रहती है। प्रकृति जड़ है, ब्रह्म चेतना उसे गति प्रदान करती है, सो ईश्वर इस प्रकृति के अधीन जीव की बारम्बार रचना करते हैं। जीव के पास कोई विकल्प नहीं होता है। उसे बार बार इस जगत में आना होता है। और जीव अपने स्वभाव के अनुरूप सुख और दुख का अनुभव करता है। किंतु जब जीव ईश्वरीय चेतना से तादम्य स्थापित कर लेता है, तब वह अपनी बुद्धि, अपने विवेक से स्वतंत्र होकर ब्रह्म चेतना के अधीन होकर इन विभिन्न सुख दुख के अनुभव से मुक्त हो जाता है। जीव की रचना उसके कर्मों के अनुरूप होती है और कर्मों से मुक्ति ही ब्रह्म चेतना की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
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