विष्णुसहस्त्रनाम



ईश्वर कौन है?
 इस प्रश्न का उत्तर समझने समझाने के लिए   विष्णुसहस्त्रनाम में विष्णु के वर्णित 1000 नामों का   सहयोग ले सकते हैं  ताकि हम सब ये समझ सकें कि ईश्वर वही है जो हम अपने समस्त सद्गुणों के साथ  हैं । यानी ईश्वर कोई पृथक सत्ता नहीं है बल्कि ईश्वर ईश्वरत्व का मूर्त नाम है, ऐसे गुणों का समग्र संग्रहण है जो हम सब में होते हीं होते हैं। जो अपने इन गुणों को जितना उभार पाता है वह उतनी मात्रा में ईश्वर को पहचान पाता है और जितना पहचान पाता है अपने सद्गुण आधारित कर्मों से उतना वह स्वयम ईश्वर होता है।
   तो आइए हम  विष्णु के एक एक नाम के सहारे समझें कि ईश्वर कौन है।
1.विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 1

1.विश्वम
          विष्णु ही संसार हैं। वे विश्व हैं, विश्व के रचयिता हैं और विश्व रचने के उपरांत उसी विश्व में समाहित हैं। इस प्रकार विश्व ही ब्रह्म स्वरूप है और ब्रह्म हीं विश्व स्वरूप भी है। इस प्रकार ईश्वर और विश्व दोनों ही एक हैं क्योंकि रचनाकार का वास अपनी रचना में है। सम्पूर्ण विश्व विष्णु की उपस्थिति का एक मूर्त स्वरूप है।
   इस प्रकार इस विश्व में हमारी उपस्थिति निश्चित ही वंदनीय है और हमारा यह दायित्व है कि हम विश्व को उसकी सम्पूर्णता में ग्रहण कर उसके हितार्थ अपने कर्म करें। जब विश्व ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही विश्व स्वरूप है तो फिर हम भी जो भी इस विश्व में हैं वे सभी ईश्वर के अंश हैं और ईश्वर हमारे अंशों की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति है।  इस लिए हम सभी का दायित्व है कि हम विश्व के प्रति पूरी जबाबदेही से अपने दायित्वों को पूरा करें।
2.विष्णु
      ईश्वर कौन हैं, जब हम इस प्रश्न का उत्तर खोजते हैं तो पाते हैं कि ईश्वर समय, स्थान और वस्तु से परे हमेशा और हर जगह हर मूर्त और अमूर्त में निवास कर रहें होते हैं। ईश्वर ही रचनाकार है और वही रचना में भी है। 
   वस्तुतः मनुष्य के सोच का दायरा भी तो समय, स्थान और वस्तु से परे है। इस सोच के दायरे में सब कुछ है, सम्पूर्ण अतीत है, सम्पूर्ण वर्तमान है और सम्पूर्ण भविष्य है। वह सब कुछ है जो हो सकता है। ईश्वर भी वही है , वह वह सबकुछ है जो सम्भव है और जो असम्भव है, जो सबमें है और सबसे बाहर भी है। काल, स्थान और वस्तु से न तो ईश्वर को परिभाषित किया जा सकता है न ही मनुष्य की सोच को। ये मनुष्य की सोच ही है जो उसे ईश्वर को पाने के लिए प्रेरित भी करती है और उसे पाकर भी खो देने के लिए भी प्रेरित करती है। 
      जब हम ये समझ पाते हैं कि सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य अस्तित्व का प्रसार हमारे अंदर है तब हम अपनी सम्भावनाओं को सम्भव की सीमा से भी आगे लेकर चले जाते हैं। हम मूर्त रूप से शरीर होते हुए भी अमूर्त रूप से हर दृश्य और अदृष्य में अपनी उपस्थिति अपने सोच के माध्यम से दर्ज करा देते हैं। यही समझ हमें समझाती है कि हम उसी रचना के अंश हैं जो हर जगह हर समय हर वस्तु में विद्यमान होती है। हमारी यह अनुभूति ही हमें विष्णु होने का भान देती है। हम ही विष्णु हैं, विष्णु ही हम हैं। न हम ईश्वर से विलग हैं और न ईश्वर हमसे विलग है। यह सत्य इस पर निर्भर करता है कि हम ईश्वर की सर्वव्यापकता को अपने अंदर कितना ढूँढ पाते हैं।यदि हम इस सत्य को अपने अंदर से खोजकर अपने कॉन्सियसनेस का सजग भाग बना लेते हैं तो हम  विष्णु होने की अनुभूति को महसूस कर सकते हैं। विष्णु की सर्व्यापकता हमारे सेल्फ के विस्तार से ही हमें समझ में आ पाती है। इस सत्य को जो खोज पाता है वही विष्णु होता है।
3.वष्टकारः
योगमार्ग में जो नियत कर्म किये जाते हैं वे यज्ञ में  क्रियाएं होती हैं जिनको हम ईश्वर को समर्पित कर करते हैं। जिनको समर्पित कर हम यज्ञ कर्म करते हैं वही तो विष्णु है, ईश्वर हैं। योगमार्ग में नियत कर्म यज्ञ हैं अर्थात वे कर्म हैं जिनको हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित हो कर किया करते हैं और उनमें सेवा का भाव होता है न कि उनको करने में अहंकार का कोई भाव आता है। यह समर्पण जिनके प्रति होता है वे विष्णु यानी ईश्वर हैं। जब हम योगमार्ग पर चलकर सेवा भाव से समर्पित होकर कर्म करते हैं तो जिनके प्रति हमारा निष्काम समर्पण है वही ईश्वर हैं, वही विष्णु हैं।
4-भूतभव्य भवतप्रभु

विष्णु यानी ईश्वर प्राणियों के अतीत, भविष्य और वर्तमान के स्वामी होते हैं। हम सभी अपने कर्मों के नियन्ता होते हैं और उनके परिणामों के भागी भी होते हैं। हमारे अतीत, भविष्य और वर्तमान का निर्माण भी हमारे कर्मों के परिणाम में ही होते हैं। जीवन में हमारे पास अच्छे और बुरे दोनों तरह के कर्मों को करने के विकल्प होते हैं। जब हम सद्गुणों के अधीन होकर कर्म करते हैं तो हमारे  अतीत, वर्तमान और भविष्य का निर्माण भी उन्हीं के अनुरूप होता है और यदि हम दुर्गुणों का मार्ग पकड़ते हैं तो फिर हमारे जीवन के हर काल में ही उनका परिणाम परिलक्षित होता है।  सद्कर्मों को कर्मयोग के मार्ग से यज्ञ भाव से करता व्यक्ति ज्ञानयोग /भक्ति योग/ध्यानयोग की यात्रा करता हुआ मोक्ष को प्राप्त होता है और इस मोक्ष की अवस्था में जीवात्मा का अस्तित्व परमात्मा में विलीन होकर स्थान और काल से परे हो जाता है। 
    विष्णु हमारे सद्कर्मों में , हमारे योग कर्मों और योगाभ्यास में निवास करते हैं। यदि हम इनको अपने कर्मों के लक्ष्य के रूप में नहीं रख पाते तो हमारे अतीत, भविष्य और वर्तमान का स्वरूप बदरंग हो जाता है, किन्तु यदि हम इनको ही अपना ध्य्य बनाकर चलते हैं तो फिर हमारा हर काल इनको समर्पित होता हुआ अंततः हमें जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त कर कालातीत कर देता है।
5-भूतकृत

इस स्वरूप में विष्णु यानी यानी ईश्वर जगत के निर्माता हैं। रजो गुण की सहायता से ईश्वर व्हतीं यानी प्राणियों को रचता है। गुण तीन प्रकार के होते हैं। जब ईश्वर इनमें से एक रजोगुण को लेकर रचना की क्रिया करता है तो उसे भूतकृत कहते हैं।यानी ईश्वर वो है जो रचता है, जो प्राणियों के होने का कारण होता है।
      मनुष्य के अंदर में भी तीनों गुण होते हैं, यानी तमो, रजो और सत्व गुण। तमो गुण की अधिकता विनाश का कारण बनती है लेकिन रजो गुण की अधिकता से व्यक्ति रचना के पथ पर अग्रसर होता है। ईश्वरत्व की प्राप्ति के मार्ग पर योगक्रिया करता मनुष्य जब अग्रसर होता है तो कर्मयोग के मार्ग पर उसका क्रमिक विकास होता है। इसी क्रम में उसमें गुणों की अवस्था में उत्तोरोत्तर विकास होता है जब रजो गुण तमोगुण से अधिक होते हैं और धीरे धीरे वह तमोगुण को काटता हुआ रजोगुण को प्राप्त करता है तो उसके अंदर का रचनाकार भारी पड़ने लगता है। वह निर्माण की तरफ अग्रसर होता है। मनुष्य की इसी क्षमता को विष्णु द्वारा अपने रचियता स्वरूप में दिखलाया जाता है।
6-भूतभृत

विष्णु ही सभी के पालनहार हैं, वही सभी का ख्याल भी रकहते हैं, सभी का पोषण भी करते हैं, सभी को पालते भी हैं और वे ये सब सत्वगुण में अवस्थित होकर करते हैं।
         हम इस ईश्वरीय विभूति का प्रतिपल प्रत्यक्ष दर्शन भी करते हैं और इस विभूति को प्रत्येक व्यक्ति के अंदर पाते भी हैं।  जब व्यक्ति योग की परम अवस्था प्राप्त करता है तो वह सभी चर अचर के अस्तित्व की रक्षा करने लगता है, उसे किसी से वैर नहीं होता है। बिना वैर भाव के योगी व्यक्ति सभी का समान भाव से ख्याल करता हुआ उनकी रक्षा करता है। उसके अंदर किसी भी तरह का शत्रु भाव किसी के प्रति नहीं होता है। वह व्यक्ति भी विष्णु की इस विभूति से अलंकृत हुआ होता है।
7-भावः

विष्णु ब्रह्मांड स्वरूप स्थित होते हैं। वे नित्य रूप होते हुए भी स्वतः ही अस्तित्व में होते हैं। ईश्वर का अस्तित्व किसी बाहरी कारक पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि ईश्वर तो स्वतः ही हैं।
        यदि व्यक्ति खुद के सेल्फ को , अपनी आत्मा को समझ पाता है, उससे एकाकार हो पाता है तो वह समझ पाता है कि उसका अस्तिव सम्पूर्ण विस्तार का एक प्रतिरूप है , वह उस वृहत अस्तित्व से भिन्न नहीं है जो ईश्वर के रूप में हर जगह विद्यमान है।
8-भूतात्मा

ईश्वर सभी प्राणियों के अंदर बसने वाला उनकी आत्मा है। यह उनकी चेतना है। श्रीमद्भागवद्गीता में जड़ और चेतन के स्वरूप को समझाते हुए वर्णित है कि जब जड़ का यानी प्रकृति का संयोग चेतना से होता है तो जीव का आविर्भाव होता है। यानी बिना आत्मा के , बिना चेतना के तत्व मात्र जड़ हैं। बिना ईश्वरीय उपस्थिति के हम सभी मात्र निर्जीव यंत्र मात्र होते हैं।
     यह सत्य हम सभी पर , हम सभी जीव धारियों पर समान रूप से लागू होता है। हम सभी स्वयम के अंदर ईश्वर को धारण करते हैं। अब हमें इसकी अनुभूति कितनी होती है यह हमारे अपने संस्कारों पर निर्भर करता है किंतु ईश्वरत्व तो समान भाव से सभी में विद्यमान है ही।
9-भूतभावनः

ईश्वर ही सभी को रचते भी हैं और वही सभी के विकसित होने और उनकी वृद्धि के कारण भी होते हैं। 
         सम्पूर्ण संसार, दृश्य और अदृश्य, चर और अचर ईश्वर की रचना भर हैं। हम सभी उन्हीं विष्णु यानी ईश्वर के स्वरूप मात्र हैं, जड़ में भी और चेतन में भी। जब हम ईश्वर की ही रचना हैं, उन्हीं के जड़ और चेतन प्रकृति के संयोग मात्र हैं तो हम अपने जड़ और चेतन दोनों रूपों में ईश्वर ही हैं। अब यह हमारे संस्कारों की जो स्थिति है तय होता है कि हम कितने हद तक खुद के ईश्वरीय होने की समझ को समझ पाते हैं। 

2.विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 2

10.पूतात्मा
       विष्णु पविते आत्मा हैं, सभी गुणों से अतीत हैं। ईश्वर तमोगुण रजोगुण और सत्वगुण से परे पवित्र और विशुद्ध चेतना हैं। इन तीन गुणों का तथा उनके द्वारा जनित असंतुलनों और अशुद्धियों से ईश्वर मुक्त होते हैं।
       हर व्यक्ति में ईश्वरीय वास होता है। ईश्वर हर व्यक्ति की चेतना स्वरूप उपस्थित होते हैं, उसके आत्मा यानी सेल्फ के स्वरूप में। जब व्यक्ति अपने गुणों से मुक्ति का प्रयास करता है तब उसका साक्षात्कार ईश्वर के साथ प्रारम्भ हो पाता है। इसका मार्ग है योग का मार्ग। अपने गुणों की अवस्था को पहचान कर जब व्यक्ति कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग के अनुसरण से अपने गुणों से मुक्ति पाता है तब शरीर रहते हुए भी वह शरीर से परे अपने आत्मस्वरूप को प्राप्त करता है। व्यक्ति की यही अवस्था उसकी ईश्वरीय अभिव्यक्ति की अवस्था होती है जब उसकी आत्मा ही , उसकी निर्गुण चेतना ही उसकी अभिव्यक्ति बन जाती है। 

11.परमात्मा
         ईश्वर यानी विष्णु परम् आत्मा हैं अर्थात सर्वक्षेष्ठ आत्मा हैं। अर्थात ईश्वर चेतना की यह अंतिम सीमा हैं जिसके आगे कोइ चेतना नहीं है यानी अल्टीमेट कॉन्सियसनेस ही परमात्मा है।
     इस प्रकार ईश्वर कारण-प्रभाव से मुक्त है, हमेशा शुद्ध रूप में है, हमेशा बुद्ध स्वरूप है और हमेशा मुक्त है। यह ईश्वरीय लक्षण हैं जो चेतना के परम स्वरूप में होते हैं।

12.मुक्तानाम परमा गतिः

                   जब तक ईश्वरीय चेतना नहीं आती है तब तक जीवन के उलझनों से मुक्ति नहीं मिलती है, लेकिन ईश्वरीय चेतना की प्राप्ति के साथ ही व्यक्ति अपने कर्मों का वास्तविक उद्देश्य समझ पाता है। वह समझ पाता है कि उसकी मुक्ति का मार्ग ईश्वरीय  विभूतियों की प्राप्ति है और यही उसका परम् लक्ष्य है। विष्णु यानी ईश्वर की आराधना से ही उसे इन विभूतियों की प्राप्ति हो पाती है। जब व्यक्ति योगमार्ग का अनुसरण करते हुए आत्मसाक्षात्कार के उस स्तर को प्राप्त कर लेता है तो कर्म करते हुए भी कर्मों के बंधन से मुक्त  होकर  परम् लक्ष्य को यानी मुक्ति को हासिल कर पाता है।

13.अव्ययः
           जिसका विनाश नहीं होता है, जिसका परिवर्तन नहीं होता है वही है वह जिसका व्यय नहीं नहीं होता है। सो विष्णु यानी ईश्वर  का विनाश नहीं होता है, उसका क्षय नहीं होता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है।
       जब व्यक्ति योगकर्म के रास्ते उस अवस्था में पहुँचता है जँहा वह अपने ईगो को भूलकर आने सेल्फ में अवस्थित हो जाता है उस अवस्था में वह शरीर से मुक्त हो चुका होता है। उस अवस्था में व्यक्ति देह से मुक्त होकर परिवर्तनविहीन और क्षयविहीन हो जाता है।

14.पुरुषः
           शरीर एक घर है और जो इस घर में रहता है वह पुरुष है। इस प्रकार ईश्वर वही आकार ले लेता है जो हम उसे अपनी कल्पना से देते हैं। इस शरीर को उसकी गति-मति उसकी आत्मा ही देती है। इस प्रकार ईश्वर हममें बसने वाली आत्मा है, यही हमारी गति और मति है और हमारा दायित्व है उसे सम्भाल कर उसके शुद्ध रूप को बनाये रखना।
    पुरुष वह भी है जो प्रिमोरडीएल कॉन्सियसनेस है अर्थात जो सभी के पूर्व से बना हुआ है। यानी ईश्वर सबसे पहले से उपस्थित है और सभी का कारण है।
    पुरुष उसे भी कहते हैं जो उत्कर्षशाली विभूतियों से विभूषित है, जो विशेष दैवीय ऐश्वर्य से परिपूर्ण है।
   पुरुष ही है वह जो सभी कर्मों का फलदाता है, जो हमारे कर्मों के अनुशार हमें उनके फल देता है।
   इस प्रकार हम देखते हैं कि विष्णु यानी ईश्वर  पुरुष रूप में हमारे होने का कारण भी है, वही हमारी मूल चेतना भी है,वही हममें उत्कर्षशाली विभूतियों को प्रदान भी करने वाला है और उसी के कारण हमें  अपने कर्मों के फल भी मिलते हैं।  

15.साक्षी
      ईश्वर सभी में , चर में ,अचर में, जीव में, निर्जीव में विद्यमान है सो वह  बिना किसी माध्यम के सभी का मूल स्वरूप का ज्ञाता है। वह मात्र द्रष्टा है, वह उनके क्रिया कलाप में कोई हस्तक्षेप नहीं करता है बल्कि मात्र उनके साक्षात को देखता समझता है। वह उनके किसी भी क्रिया का न तो कारण बनता है, न ही फल, वह मात्र साक्षी होता है उनके सभी क्रिया कलापों का।
     जब व्यक्ति खुद ही योगकर्म के मार्ग पर चलकर अपने तीनों गुणों से पार पा लेता है तो वह स्वयम इस अवस्था में आ जाता है जब वह किसी कर्म को न तो किसी कारण वश करता है और न ही किसी कर्म फल का भोक्ता होता है बल्कि मात्र और मात्र अपने कर्मों का द्रष्टा मात्र होता है। 

16 क्षेत्रज्ञ
           क्षेत्र का अर्थ शरीर होता है और जो इस शरीर के भेद को जानने वाला है वही क्षेत्रज्ञ कहलाता है।  ईश्वर यानी विष्णु को क्षेत्र का यानी शरीर का ज्ञाता कहा जाता है। यह शरीर ही है जो प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है और इसकी आत्मा इस शरीर को चेतना प्रदान करती है जिससे यह शरीर खुद को माद्यम बनाकर व्यक्ति के मोक्ष का उद्यम करता है। शरीर को उसका अर्थ उसकी आत्मा से प्राप्त होता है और शरीर की आत्मा परम् पिता परमेश्वर का ही अंश है। सो ईश्वर ही शरीर के अर्थ को समझता है, वही इस शरीर को जीवन का अर्थ भी देता है।
     जब व्यक्ति योगकर्म करता हुआ उस अवस्था में पहुँचता है जँहा उसे इस शरीर से परे अपने स्व यानी अपनी आत्मा का बोध हो जाता है तो वह भी इस स्थिति में होता है कि वह इस शरीर को निर्देश दे सके कि इस शरीर का क्या कर्म हो कि व्यक्ति मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सके।

17.अक्षर
        ईश्वर यानी विष्णु का कोई अंत नहीं होता है। यह तो नित्य, अविनाशी है, उनका क्षय नहीं होता है।
      जब व्यक्ति को आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, जब व्यक्ति अपनी आत्मा में ही ईश्वर का विस्तार पा लेता है तो उसे भी शरीर के क्षय से कोई लेना देना नहीं रह जाता है और वह भी शरीर से परे विद्यमान होता है। 

3.विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 3

18.योगः
        विष्णुसहस्त्रनाम के तीसरे श्लोक में विष्णु के जो सात नाम बताए गए हैं उनमें पहला नाम योगः है। योग क्या है। दरअसल जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है, परमात्मा की अभिव्यक्ति ही जीवात्मा है और यह सभी में समान है। लेकिन इस सत्य का ज्ञान तब तक नहीं होता है जब तक जीवात्मा योगमार्ग पर नहीं अग्रसर होती है। जब आप सभी ज्ञानेन्द्रियों और मन के भावों से ऊपर उठ जाते हैं तो जीवात्मा का परमात्मा में  विलय हो जाता है। यह योग है।
    इस प्रकार योग साधन भी है, साध्य भी है। योग ही वह साधन है जिससे एकत्व भाव से जीवात्मा और परमात्मा का विलय हो पाता है और यह विलय ही योग है। अर्थात ईश्वर यानी विष्णु मार्ग भी हैं और गंतव्य भी। जीवात्मा ईश्वरीय पथ पर चलकर ही ईश्वर को प्राप्त करती है।

19.योगविदां नेताः
        परमात्मा योगविद्या के ज्ञाता तो हैं ही, साथ ही योगविद्या जानने वालों के सिरमौर भी हैं यानी उनमें भी सर्वश्रेष्ठ हैं। विष्णु ने स्वयम लोगों को योग की शिक्षा दिया है श्रीमद्भागवद्गीता में। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि इस योग विद्या को जानने वाले पूर्व से ही मौजूद रहे हैं। सो हम आप कोई भी इस ज्ञान को अर्जित करने में सक्षम हैं। यह योग ज्ञान चूँकि ईश्वर को भी है सो ईश्वरीय ज्ञान से युक्त होकर हम भी ईश्वरत्व को प्राप्त करने में सक्षम हैं। 
किसी ज्ञान को सम्पूर्ण रूप से जानने का अर्थ है कि आप उस ज्ञान को पहले सामान्य रूप से जानते हैं, फिर उसपर मनन चिंतन करते हैं , फिर उसको आत्मसात करते हैं और तदुपरांत आप उसे व्यवहार में भी लाते हैं और तब उसके परिणामों के भी भागी होते हैं। योगविदां वही  जो इन पांचों चरणों से गुजरता हो और ईश्वर के लिए ये पांचों चरण सुलभ प्राप्त हैं । जब आप भी पा लेते हैं तो आप भी ईश्वरत्व के अधिकारी होते हैं।
    अब देखें कि विष्णु ही योग भी हैं और योविद्या भी, अर्थात साधन भी और साध्य भी।अर्थात जब आप ईश्वरीय गुणों, पराक्रमों और लक्षणों से युक्त होकर आगे बढ़ते हैं  तो ही आपको ईश्वरत्व की प्राप्ति हो पाती है न कि गलत कामों को कर के आप उस स्तर को हासिल कर पाते हैं।
    विष्णु सभी योग ज्ञाताओं में उनके अगुआ है, उनके नेता है। नेता जो नेतृत्व प्रदान करे, जो आपका मार्गदर्शक हो, जो आपको सम्यवयित करे , जो आपको उत्साहित करे और लक्ष्य को हासिल करने में आपकी सहायता करे।  नेता ही आपका ख्याल भी रखता है और आपकी सफलता के उपाय भी करता है, आपको नेता के प्रति अपनी निष्ठा बनाये रखनी है। ईश्वर के नेतृत्व में ईश्वरीय गुणों से युक्त होकर यानी योग विद्या से युक्त होकर आप ईश्वरत्व को प्राप्त करते हैं।

20.प्रधान-पुरुषेश्वरः
       पुरुष जीवात्मा की अभिव्यक्ति है।  जो पुरुष में सर्वश्रेष्ठ है अर्थात जो सभी चेतना को नियंत्रित करता है वही पुरुष का नियन्ता है। प्रधान प्रकृति की अभिव्यक्ति है। प्रकृति और पुरुष, यानी मैटर और चेतना का योग है वह भी विष्णु यानी ईश्वर का ही द्योतक है। जब आप गहराई से अपने अपने अस्तित्व को टटोलते हैं तो पाते हैं कि आपकी चेतना आपके प्रकृति के साथ युक्त होकर जो रूप आपको प्रदान करती है उस रूप के सबसे स्वक्ष स्थिति में आपमें देवत्व ही प्रकट होता है। ये बात और है कि पुनः हम अज्ञानतावश इस पवित्र रूप के ऊपर तरह तरह के प्रदूषित आवरण चढ़ा देते हैं। 

21.नारसिंहवपहु
 सत्य और भक्ति परम शक्तियों द्वारा संरक्षित हैं जो केवल विष्णु या भगवान की अभिव्यक्ति हैं।  और यह सुरक्षा किसी भी रूप में आती है जो ज्ञात या अज्ञात हो सकती है, जिसे माना या अनुभव नहीं किया जा सकता है।  भगवान नरसिंह मानव रूप और सिंह रूप के मेल हैं।  यह रूप कल्पना से परे है।  इस रूप ने भक्त प्रह्लाद को उसके शैतान पिता हिरण्यकश्यपु से बचाते हैं। इससे पता चलता है कि भगवान कोई भी आकार और रूप ले कर सद्गुणों की रक्षा कर सकते हैं।

22.श्रीमान
           विष्णु श्रीमान हैं यानी वे ऐश्वर्य के स्वामी हैं। ऐश्वर्य का अर्थ हम भौतिक संपत्तियों से निकालते हैं किंतु ऐश्वर्य तो वो सब है जो बहुमूल्य या या इतना मूल्यवान की जिसकी कीमत भी हम नहीं आंक सकते हैं। ज्ञान, विज्ञान, चरित्र, बुद्धि, विवेक, आदि भी तो ऐश्वर्य ही हैं और ईश्वर इन सब को धारण करते हैं यानी जिसके पास इन ऐश्वर्यों की विभूति होती है उनमें ईश्वरत्व का वास होता है।

23. केशवः
           एक अर्थ में ईश्वर को सौंदर्य के रूप में हम देखते हैं  इस स्वरूप में ईश्वर के अलंकारिक केस विन्यास को हम सौंदर्यबोध के रूप में लेते हैं जिससे हम ये समझते हैं कि ईश्वरीय स्वरूप सौंदर्य को प्रदान करता है।
    दूसरे अर्थ में हम समझते हैं कि केशव नाम से हम ये समझते हैं कि ईश्वर ब्रह्मा, विष्णु, और शिव के संयोग हैं अर्थात सभी ईश्वरीय गुणों से विभूषित हैं।
    पौराणिक मान्यताओं में केशी राक्षस का नाश करने वाले को केशव कहते हैं।  अर्थात ईश्वर इस संसार से दुष्ट या गलत प्रवित्तियों का नाश करने वाला होता है। अर्थात जब व्यक्ति में ईश्वरीय अनुभूति की वृद्धि होती है तो उसकी बुरी प्रवृत्तियों का नाश होता है या ऐसे समझें कि खुद के अंदर की  बुरी प्रवृत्तियों का  नाश करने से हमारे अंदर ईश्वरीय अनुभूति की वृद्धि होती है।
     इस प्रकार ये तीनों व्याख्याएँ आपस में जुड़ी हुई हैं। जब हम खुद के अंदर की बुराई को मारते हैं तो  हमें ये बोध होता है कि हममें ही सृष्टि के निर्माण, उसके पोषण और उसके विनाश की क्षमता भी है और बुराई की अनुभूति से  रहित हमारी दृष्टि को  पूरा ब्रह्मांड ही अति सुंदर दिखता है।

24.पुरूषोत्तमः
           सभी जीवात्माओं में जो सर्वश्रेष्ठ है वही ईश्वर है यानी जो कामना, क्लेश, कर्म और कर्मफल से मुक्त है वही विशेष पुरुष है यानी परमात्मा है। इस प्रकार ईश्वर किसी भी व्यक्तिगत आत्मा से ऊपर है और उसमें समस्त सद्गुण विराजमान हैं।

विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 4

25. सर्वः
       जव हम ईश्वर को सर्व नाम से इंगित करते हैं तब हम ईश्वर की उस विशेषता को इंगित कर रहें होते हैं जिसके अनुसार ईश्वर सभी सत और असत के होने और विलुप्त होने का कारण होता है। वह सब कुछ का ज्ञाता होता है और हमेशा के लिए ज्ञाता होता है। इसका अर्थ है कि ईश्वर से बाहर कुछ भी नहीं है ,सब उसकी जानकारी में है, सब उसी के कारण है और सब कुछ उसकी जानकारी में सदा सदा से है।

26. शर्व 
          प्रयेक भौतिक स्वरूप का अंत भी निश्चित होता है । ईश्वर संहार के उस निश्चित समय पर अर्थात उसके प्रलय समय पर उसका संहार भी करते हैं
 अर्थात सृजन के साथ साथ सृजित हुए भौतिक तत्व के संहार और उसके विलोपीकरण का अधिकार भी ईश्वर के पास हीं है।

27.शिवः
           सत्वगुण, रजोगुण और तमोंगुण, इन तीन  गुणों के आपसे संयोग से सभी क्रियाएँ निर्धारित होती हैं और इन तीन गुणों की उपस्थिति के अनुपात से ही सब कुछ संचालित होता है। इस प्रकार इनके ही कारण संसार में उसके मौलिक स्वरूप में असन्तुलन का जन्म होता है। किंतु ईश्वर इन गुणों से मुक्त होता है, इनसे प्रभावित नहीं होता है सो वह किसी भी असन्तुलन से अछूता होता है। ईश्वर के इसी स्वरूप को शिव नाम से सम्भोधित करते हैं।

28.स्थाणु
         ईश्वर स्थिर होते हैं। उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता।  स्थाणु नाम से विष्णु को भी बुलाते हैं और शिव को भी। दरअसल ये सिर्फ नाम व्यक्त करने की भिन्नता है, वास्तव में ईश्वर तो एक ही है और वो सदा स्थिर है।

29.भूतादि
           जो कुछ इस संसार में है , वह सब पंच महाभूतों के संयोग का विभिन्न स्वरूप है और सभी जीव भी पंचमहाभूत के ही संयोग से उतपन्न हैं। नारायण इस सभी के आदि कारण हैं अर्थात उनके मूल कारण हैं।

30.अव्ययः निधिः
           जब प्रलय काल आता है तो सभी कुछ वापस भगवान नारायण में लौटकर स्थिर हो जाता है। व्यस्तुतः किसी का समपूर्ण विनाश या अंत नहीं होता है बल्कि सब कुछ वापस ईश्वर में समाहित हो जाता है जो सब कुछ का निधि है। ईश्वर ऐसे निधि यानी सम्पदा हैं जिनका व्यय नहीं होता है अर्थात जिनका नाश नहीं होता है। इस प्रकार ईश्वर नहीं नष्ट होने वाली वो सम्पदा हैं जिनमें सब कुछ समाहित होता है।

31.सम्भवः
           ईश्वर स्व इक्षा से संचालित हैं। उनका अविस्मरणीय और अद्भुत जन्म उनकी अपनी मर्जी से होता है, इसमें किसी का कोई वश नहीं होता है। अर्थात ईश्वर स्वयम को प्रकट करते हैं जब उनको इसकी इक्षा होती है।

विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 5

37.स्वयम्भू
       नारायण का यह नाम स्वयम्भू इंगित करता है कि ईश्वर स्वयम की मर्जी का मालिक है। ईश्वर पर किसी बाहरी कारण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वह अपनी इक्षा से ही सब कुछ करता है या नहीं करता है।

38.शम्भू
       नारायण अपने भक्तों को उनकी भक्ति के कारण सुख  और प्रसन्नता देने वाले हैं । इसलिए उनको शम्भू कहते हैं।

39.आदित्य
      भगवान नारायण सूर्य से भी समझा जाता है। नारायण का तेज, उनके द्वारा प्रकाशित ज्ञान का प्रकाश उसी तरह से है जैसे सूर्य की रौशनी होती है। भगवान उस ऊर्जा के अक्षर स्रोत हैं जो जीवों का पोषण करता है। 
      इसी प्रकार सूर्य की व्यापकता को भी आदित्य से वर्णित करते हैं जो विष्णु हैं। 
 एक अन्य व्याख्या के अनुसार भूदेवी के स्वामी को आदित्य कहते हैं जो कोई अन्य नही विष्णु हीं हैं।

40.पुष्कराक्षः
       भगवान नारायण के इस नाम से भगवान के दिव्य रूप का वर्णन मिलता है । भक्त जब भगवान को साकार रूप में देखता है तो उनको वह इस समस्त संसार का सबसे सुंदर व्यक्ति पाता है। भगवान की आँखे कमल के फूल की तरह खिली होती हैं। यह भक्त के मन में निराकार ब्रह्म का साकार स्वरूप होता है।

41.महास्वनः
      ईश्वर महान हैं यानी पूजनीय हैं। उनका नाद वंदनीय है , वस्तुतः नारायण का नाद ही वेद है।
     भगवान नारायण की अलौकिकता कई दृष्टांतों से व्यक्त होती है और दृष्टांत वेद हैं जो उनकी ही वाणी हैं।

42.अनादिनिधनः
    आदि का अर्थ है प्रारम्भ यानी जन्म और निधन का अर्थ है अंत यानी मृत्यु। लेकिन ईश्वर का न तो जन्म होता है न ही मृत्यु, उसका न तो प्रारम्भ है न ही अंत। वह सदा ही समय, काल, स्थान से मुक्त बना रहता है।

43.धाता
        सम्पूर्ण संसार और सृष्टि  को जो धारण कर उसका पोषण करने वाला है वही भगवान विष्णु हैं।

44.विधाता
      भगवान विष्णु को विधाता भी कहा जाता है। विधाता के स्वरूप में भगवान विष्णु सभी कर्मों और कर्मफलों के कारण हैं, वही कर्ता के कर्मों को भी रचते हैं और उन कर्मों के कर्मफल भी निर्धारित करते हैं। विधाता के रूप में भगवान विष्णु उनका भी भार वहन करते हैं उनको भी धारण करते हैं जो इस समस्त संसार को धारण करते हैं।

45.,46.धातु उत्तमः
       विष्णु को सम्बोधित करते हुए उनको परम् पुरुष भी कहा जाता है। वे त्रिमूर्ति से भी ऊपर माने जाते हैं। वे सृष्टिकर्ता से भी बड़े हैं।
      जब उनके नाम को उलट कर बोलते हैं यानी जब उत्तमः धातुः से सम्बोधित करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि विष्णु पञ्च धातुओं से ऊपर हैं, वे परम् तत्व हैं क्योंकि उनमें परम् चेतना है।
   अगर इन नामों को अलग अलग कहें तो धातुः परमात्मा को सम्बोधित करता है जो परम् चेतना का स्वामी होकर कारण और परिणाम का कारण होता है। नारायण वह पवित्र चेतना हैं जो सम्पूर्ण जगत को नियंत्रित करता है जो कर्म और कर्मफलों की श्रृंखला है।
     और उत्तमः परमात्मा को इस रूप में व्यक्त करता है जो उन सबों से श्रेष्ठ है जिनका उद्गम हुआ है। कुछ भी अन्य भगवान नारायण से उत्तम नहीं है।

विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 6

47.अप्रमेय
        भगवान नारायण को किसी माध्यम से यथा इन्द्रियों के द्वारा अथवा बुद्धि या विवेक से नहीं जाना जा सकता है। ईश्वर तो स्वयम ही साक्षी है तो फिर किसी अन्य साक्ष्य के माध्यम से उसे भला कैसे जान सकते हैं हम। किन्तु ईश्वर को महसूस जरूर किया जा सकता है। लेकिन ईश्वर को हम तभी अनुभव कर सकते हैं जब हम स्वयम में ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकें।

48.हृषीकेशः
   भगवान नारायण के अधीन ही सभी इन्द्रियाँ है। वे ही इन इन्द्रियों के नियंता और स्वामी हैं। परमात्मा ही चेतन का स्वामी है और इसी कारण उनको हृषिकेश कहा जाता है।
   एक अन्य व्याख्या के अनुसार भगवान नारायण को हृषिकेश इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि उनके सुंदर बाल ऊर्जा के प्रतीक हैं , ये केशविन्यास सूर्य और चंद्रमा की श्मियों को इंगित करती हैं।

49 पद्मनाभ
            पुराणों की कथा के अनुसार भगवान विष्णु के नाभि से कमल की उत्पत्ति होती है जिसपर ब्रह्मा होते हैं। दरअसल भगवान के पडनाभ स्वरूप का अर्थ ये है कि भगवान विष्णु ही समस्त सृष्टि के जन्म के केंद्र हैं, कारण हैं। वही इस चर-अचर संसार के अस्तित्व में आने के लिए कारण हैं।

50. अमरप्रभु
             मनुष्यों के हित को संवारने वाले देवता होते हैं । भगवान नारायण इन देवताओं के भी स्वामी हैं और इस प्रकार जीवों के हितार्थ अंतिम शरण होते हैं भगवान नारायण।

51.विश्वकर्मा
         भगवान नारायण समस्त जगत के उतपत्ति के कारण हैं। वे सभी कर्मों के कारण और सभी कर्मों के कर्मफल के कारण होते हैं जिस कारण उन्हें विश्कर्मा कहा जाता है। विश्वकर्मा नाम भगवान नारायण के सर्वश्रेष्ठ और सबसे उत्तम कर्मों और रचनाकार होने को व्यक्त करता है।

52.मनुः
          भगवान नारायण को मनुः के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। मनु उसे कहते हैं जो क्रमवार  तार्किक ढंग से सोचता हो और करता हो। ईश्वर का कोई भी कर्म या निर्णय अतार्किक अथवा अनावश्यक नहीं होता है। 
        मनु का एक दूसरा अर्थ प्रजापति भी होता है अर्थात जो प्रजा का उत्पत्ती करने वाला । ईश्वर सभी प्राणियों की उत्पत्ती और उनमें संस्कारों के संचार का कारण भी होते हैं सो उन्हें मनुः कहा गया है।

53.त्वष्टा
           प्रलय के समय समस्त चर और अचर का नाश नहीं होता है बल्कि वे सभी वापस परम् ईश्वर में ही जाकर मिल जाते हैं और ईश्वर पुनः जीवन चक्र प्रारम्भ करते हैं। चूँकि प्रलय काल में सभी वापस भगवान नारायण में ही समाहित हो जाते हैं और यह भगवान नारायण ही सम्भव करते हैं सो उनको त्वष्टा कहा जाता है।

54. स्थविष्ठ
            ईश्वर यदि सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्म हैं तो विशालतम से भी विशाल हैं। ईश्वर की विशालता में सब कुछ समाहित है , सभी उसी विशालता , महत्तम महता के अधीन हैं।

55.स्थविरह ध्रुः
        भगवान नारायण पुरातन हैं यानी प्रारम्भ से हैं परंतु वे अपरिवर्तनीय हैं, अक्षर यानी क्षय मुक्त हैं अर्थात भगवान नारायण सदा से , पुरातन काल से बिना परिवर्तन के अस्तित्व में बने हुए हैं।

56.अग्राह्य
    मनुष्य भगवान नारायण  कर्मेन्द्रिय के माध्यम से नहीं समझ नहीं पाता है सो वे अग्राह्य कहे जाते हैं। पूर्व में हमने देखा है कि भगवान अप्रमेय हैं यानी ज्ञानेंद्रियों से नहीं जाने जा सकते हैं। भगवान अग्राह्य भी हैं क्योंकि उनको कोई कर्मेन्द्रिय अनुभव नहीं कर पाती है।

57.शाश्वतः
         भगवान नारायण समय,स्थान से मुक्त हमेशा से हैं।  ऐसा कोई समय नहीं रहा है, ऐसा कोई समय नहीं होने वाला है जब भगवान नारायण न थे और न होंगे। परमात्मा से ही समय है, स्थान है वह इन सब से परे शाश्वत हैं।

58.कृष्ण
       भगवान नारायण का एक सर्वप्रिय नाम कृष्ण भी है और अवतारों की श्रुंखला में कृष्ण राम के साथ एक सबसे महत्वपूर्ण अवतार भी हैं। कृष्ण नाम भगवान नारायण के मानव रूप में काले वर्ण के कारण दिया जाता है। कृष्ण तो सचिदानंद स्वरूप हैं यानी सत, चित, और आनंद स्वरूप हैं। वे अस्तित्व, चेतना और आनंद की प्रकृति के हैं।

59.लोहिताक्षः
       भगवान नारायण के भौतिक रूप का वर्णन करते हुए भगवान नारायण को लाल आँखों वाला भी कहा जाता है। भगवान के मूर्त स्वरूप का उल्लेख उनका ध्यान करने में सहायक बनता है। 

60. प्रतर्दनः 
      प्रलय काल में भगवान नारायण ही सभी के विनाश के भी कारण होते हैं। प्रलय काल में भगवान सभी का अंत कर विलीन कर देते हैं ताकि पुनः एक नई शुरुआत की जा सके। 

61.प्रभुतः
           भगवान नारायण सभी प्रभुता यानी सभी ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं। वस्तुतः नारायण सभी ऐश्वर्य, यथा ज्ञान, शक्ति आदि के स्वामी हैं।    
         


   


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