श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 4, एवम 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 4 एवम 5
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥ 4।।
मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। ।।4।।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ ।।5।।
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है। ।।5।।
परमात्मा ही सब का कारण भी है और सब का परिणाम भी है। परमात्मा की व्यापकता को समझने के लिए हमें तीन बातें समझनी होंगी।
1. ईश्वर सर्वव्यापी है अर्थात ईश्वर इस संसार के हर कण में मौजूद है।
2. इस जगत का हर कण ईश्वर में विद्यमान है अर्थात वह अपने अस्तित्व के लिए परमात्मा पर निर्भर है।
3.ईश्वर सर्वव्यापी होकर भी अपनी उपस्थिति, अपने होने के लिए इस संसार के किसी भी सजीव या निर्जीव, व्यक्त या अव्यक्त पर निर्भर नहीं है।
4.वस्तुतः ईश्वर की वास्तविक प्रकृति के अनुसार, जगत ईश्वर में नहीं बसता है।
प्रथम चरण में जब हम सन्सार के प्रति जागरूक होते हैं तो समहते हैं कि समस्त जगत में ईश्वर व्याप्त है।इस प्रकार इस जगत में जो है वह ईश्वरीय उपस्थिति से परिपूर्ण है। सब कूछ ईश्वर के समर्थन से है।
दूसरे चरण में हम समझते हैं कि यह समस्त संसार ईश्वर में बसता है यानी अपनी उपस्थिति हेतु ईश्वरीय अनुकम्पा पर निर्भर करता है।
तीसरे चरण में हम समझते हैं कि ईश्वर की उपस्थिति संसार से मुक्त है अर्थाय ईश्वर इसलिए नहीं है क्योंकि सन्सार है। संसार रहे कि न रहे, ईश्वर हमेशा से है और बना रहेगा। ईश्वर की उपस्थिति के लिए संसार की कोई जरूरत नहीं होती है।
चौथे चरण में हम समझते हैं कि ईश्वर में कोई सन्सार नहीं बसता है।अध्यात्म के चरम पर हम समझ पाते हैं कि कंही कुछ भिन्न नहीं है बल्कि सबकुछ में एक सत्य ही है। ऐसा कुछ भी नही है जिसे इस सत्य से भिन्न संसार के रूप में देखा जा सके। इसीलिए ये समझना जरूरी है कि भले ईश्वर समस्त जगत का कारण है, वही उसका पालन करता है लेकिन वह उसमें रहता नही है, अपनी उपस्थिति के लिए इस संसार पर निर्भर नहीं करता है। बल्कि यह संसार तो मात्र उसकी एक अभिव्यक्ति भर है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यह संसार ईश्वर से है, न कि ईश्वर संसार से है। ईश्वर संसार में होकर भी नहीं है। इस तथ्य को न तो इन्द्रियाँ समझ सकती हैं , न ही बुद्धि और न ही विवेक। इसे मात्र और मात्र श्रद्धायुक्त होकर ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करने वाला ही समझ सकता है।
इन सारे तथ्यों को यूं समझे कि
God pevades me. I depend on God and God doesn't depend on me. I'm in God. God is independent of me for His existence. God is independent of my Ego. So when Ego gets dissolved God remains .In God there is no I , that means in God there is no Ego. There is no ego, no body, no mind. God is alone.
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