श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 3
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥3।।
हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं। ।।3।।
किसी भी तरह का ज्ञान हम तभी प्राप्त करते हैं जब हमें ज्ञान और ज्ञान देने वाले दोनों पर श्रद्धा होती है। श्रद्धा का अर्थ है कि विश्वास भी हो और उस विश्वास के अनुरूप उस ज्ञान का जीवन में अनुसरण भी किया जाए। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो ज्ञान की प्राप्ति की न तो उत्कण्ठा ही होगी और न ही उसे सुनने जानने के पश्चात उसका अनुसरण ही हम कर पाएंगे। गीता के ज्ञान के साथ भी यही बात है। यदि इसमें श्रद्धा है तब तो हम इस ज्ञान को समझ कर ईश्वर को प्राप्त कर पाते हैं और यदि श्रद्धा न हो तो फिर दुनियावी चक्कर में पड़े रह जाते हैं।
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