श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 9
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 9
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥ ।।9।।
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता (अंतर्यामी रूप से सब प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार शासन करने वाला) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है। ।।9।।
ईश्वर का निरन्तर चिंतन, मनन कर ईश्वर को प्राप्त तो किया जा सकता है किंतु प्रश्न उठता है कि हम ईश्वर को किस रूप में स्मरण करें, हम सभी कर्म करते हुए भी ईश्वर को किस तरह अपने स्मरण में बनाये रखें कि यह अनुभूति हमारे स्व का अविभाज्य अंश बन जाये।
इसके लिए आवश्यक है कि हम ईश्वर को उसकी निम्न विशेषताओं से स्मरण में रखें
1. ईश्वर अपने स्वरूप में सर्वज्ञ यानी सबकुछ जानने वाला है।
2. ईश्वर चिरन्तर, पुराना किंतु नया है यानी ईश्वर सब कुछ के पहले भी था और सब कुछ के बाद भी रहेगा।
3.ईश्वर सब कुछ का नियंत्रक, सब कुछ को नियंत्रण करने वाला, सभी कुछ का कारण है, वह सदा सभी जगह विद्यमान है और सभी कुछ उसी के अधीन है।
4.ईश्वर अति सूक्ष्म, सबसे सूक्ष्म, नहीं दिखने वाला है जिसे सिर्फ अपनी चेतना से जाना जा सकता है।
5.ईश्वर सबका पालन करने वाला है, सब को धारण करता हुआ ईश्वर सभी का पालनहार है।
6. ईश्वर विवेक और बुद्धि से अग्राह्य है, सिर्फ चेतना ही ईश्वर को देख समझ सकती है।
7.ईश्वर प्रकाश स्वरूप, ज्ञान स्वरूप, स्वप्रकाशित, है उसको किसी से प्रकाशित नही होना है यानी वह स्वयम प्रकाशित है।
8.ईश्वर सभी अंधकार, सभी अविद्या, अज्ञान से परे है।
जब व्यक्ति की चेतना ईश्वर की इन विशेषताओं को समझती है और उनको अपने व्यवहारिक बुद्धि में उतार लेती है तो ईश्वर की अनुभूति अपने चेतना में सदा सर्वदा के लिए हो जाती है।
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