श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 8
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 8
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥ ।।8।।
हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है। ।।8।।
जब हम ईश्वर को निरंतर अपने मन बुद्धि में रखकर कर्म करते हैं तो निश्चित ही हमें ईश्वर की प्राप्ति होती है यानी हम भी उस पद तक पहुँच पाते हैं। किंतु व्यवहारिक बात ये है कि सिर्फ इस बात का ज्ञान भर हो जाने से ऐसा होता नहीं है। ऐसा होने के लिए ये आवश्यक है कि हम निरन्तर इसका अभ्यास करें। निरंतर अभ्यास से ही हम इस सत्य को आत्मसात कर पाते हैं। इस अभ्यास से ईश्वर को हम उसी तरह चेतन और अचेतन दोनों स्थिति में अपना बना पाते हैं जैसे चेतन और अचेतन दोनों ही स्थिति में अपनी स्थिति यानी अपना नाम, अपना लिंग, अपने परिवार का ज्ञान बना रहता है। हमारे जेहन में ईश्वर की इसी प्रकार की उपस्थिति बारम्बार के अभ्यास से आती है। तब हमें ईश्वर का स्मरण करने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि वह तो हमारे व्यक्तित्व और हमारे सेल्फ का अभिन्न स्वरूप हो जाता है। तब हमें उस परम् पुरुष की स्थिति प्राप्त हो पाती है।
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