श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 6

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥ ।।6।।

हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है। ।।6।।

            ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि व्यक्ति अपने जीवन के अंत समय में जिसका स्मरण कर शरीर त्यागता है उसी भाव को प्राप्त करता है। यँहा यह ध्यान देना है कि क्या हम जीवन भर जिस चीज के आदि नहीं रहें हैं उसको जीवन के अंत समय में हठात स्मरण में ला सकते हैं अथवा क्या उस समय उसका अभ्यास कर सकते हैं। उत्तर है , नहीं। यह सम्भव नहीं है कि हम जीवन भर गलत रास्ते पर चले हों और अचानक मृत्यु के समय हम सही मार्ग पकड़ लें। वस्तुतः अंत में सही मार्ग तभी मिलता है जब प्रारम्भ से ही मार्ग सही हो। इस प्रकार शिक्षा ये है कि हमें जीवन के शेष दिनों में भी सही मार्ग पर चलना चाहिए ताकि जब जीवन का अंत समय आये तो भी हम मार्ग भटके नहीं और हमारी दिशा और दशा दोनों सही रहे। यही तथ्य जीवन के सभी आयामों पर सही उतरता है। हमारा प्रयास, हमारे कर्म हर लक्ष्य के प्रति प्रारम्भ से ही सही हों इसका हमें स्मरण रखना चाहिए ताकि जब अंत समय में उस लक्ष्य की पूर्ति हो सके। अचानक रास्ता सुधारने की कोशिश से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

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