श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 5
अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ ।।5।।
जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ।।5।।
ईश्वर को समझने और समझ कर उसे प्राप्त करने के मार्ग को सुझाते हुए श्रीकृष्ण ने बतलाया है कि ईश्वर के छह रूपों को आत्मसात करें-एक ईश्वर ही ब्रह्म है, आत्मा है, आपकी सृजनात्मकता है, वही पँचमहाभूतो से निर्मित संसार है, परम् पुरुष है और वही आपका भी शरीर सहित रूप भी है। इस तथ्य को समझ कर जो व्यक्ति हमेशा इन छह स्वरूपों के ध्यान में ,उनके ही स्वरूप में ध्यानमग्न होकर अपनी मृत्यु तक बना रहता है वह ईश्वर को ही प्राप्त होता है। जो जीवनकाल में इन स्वरूपों के मनन चिंतन में लीन हो वही मृत्यु के समय भी उनमें रमा हो सकता है। ऐसा नहीं होता कि जीवन भर कुकर्म करते रहे और अंत समय में ईश्वर चिंतन में लग गए। ऐसा होना सम्भव नहीं होता है क्योंकि व्यक्ति अपने स्वभाव से बंधा हुआ होता है। अंत समय में ईश्वर प्राप्ति का एक ही विधान है कि आप जीवन भर ईश्वर चिंतन में मनोयोग से प्रवृत्त रहें हों।
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