श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 3 , 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 3 एवं 4

श्रीभगवानुवाच

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ ।।3।।

श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है। ।।3।।

श्लोक 4

अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ।।4।।

उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ। ।।4।।

     अर्जुन के माध्यम से हमारी शंकाओं को दूर करते हुए श्रीकृष्ण ने समझाया है कि
ब्रह्म---ब्रह्म वो है जो सबसे बड़ा है , जिसमें कभी भी न तो कोई परिवर्तन होता है, अथवा न कभी जिसका क्षय होता है। अर्थात परम् अविनाशी ही ब्रह्म है। यही वो परम् चैतन्य है जो सभी शरीर, मन और बुद्धि यानी सभी मैटर को उनकी चेतना प्रदान करता है।

अध्यात्म-- परम् अविनाशी ब्रह्म सूक्ष्म होते हुए भी सभी में  समान रूप से व्याप्त है। वही सभी को उनकी चेतना प्रदान करता है और इस कारण सभी में एक ही भाव में व्यक्त होता है। यही सभी की आत्मा है यानी ब्रह्म ही प्रत्येक भौतिक स्वरूप में कृपा स्वरूप उनकी क्षमता और सामर्थ्य के रूप में व्यक्त है और इसी को उस भौतिक स्वरूप का स्वभाव भी कहते हैं।

कर्म--ब्रह्म परम् अविनाशी और सर्वव्यापी तो है , साथ ही वह सभी भौतिक स्वरूपों में उनकी चेतना के रूप में व्याप्त भी है। यही चेतना उस भौतिक स्वरूप  की सृजन शक्ति यानी वह सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति जो बुद्धि निर्माण कार्य में प्रवृत्त होकर उस भौतिक स्वरूप के विभिन्न भावों का निर्माण करती है जो कर्म कहलाता है।

अधिभूत--यह संसार पंचमहाभूतों से मिलकर बना हुआ है जिनका निरन्तर क्षय होता रहता है अर्थात जिनका स्वरूप नित्य परिवर्तनशील होता है। यह  परिवर्तनशील संसार और इसको बनाने वाले परिवर्तनशील पंचमहाभूत भी ईश्वरीय सत्ता के ही रूप होते हैं। इस प्रकार ईश्वर अक्षर ब्रह्म से भी व्यक्त होता है और क्षर पंचमहाभूतों से भी व्यक्त होता है।  

अधिदैव--सभी भूतों में उनको जो नियंत्रित करता है वह परम पुरुष अधिदैव होता है और वह भी ईश्वरीय स्वरुप की ही अभिव्यक्ति होता है। जैसे हमारे शरीर में विभिन्न अंग होते हैं जो अलग अलग पहचान तो रखते हैं किंतु उन सब को एक मौलिक तंत्र में हमारा  मैं बन्धता है,  संचालित करता है, और जो हमारे ही मैं की अभिव्यक्ति होते हैं उसी प्रकार परमपुरुष हिरण्यगर्भ ईश्वर सभी चर और अचर को संचालित करता है सो वह सभी में व्याप्त अधिदैव कहलाता है।

अधियज्ञ--व्यक्तिगत जीव को अधियज्ञ कहते हैं जो आत्मा को धारण करता है , जिसका एक शरीर विशेष होता है, जिसकी बुद्धि होती है और जिसका एक विशेष व्यक्तित्व होता है और यह व्यक्तिगत जीव भी और कुछ नहीं उसी ईश्वरीय सत्ता का स्वरूप होता है।
     इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर निराकार, नित्य अपरिवर्तनीय ब्रह्म यानी आत्मा भी है, जो चेतना प्रदान करता है जिसकी वजह से वह कर्म यानी सृजनात्मक क्षमता से भी व्यक्त होता है, वही साकार पँचमहाभूतो को भी और उनसे निर्मित इस साकार संसार और जीव में भी होता है और वही इन सभी चेतना और प्रकृति को , निराकार और साकार के संयोग को संचालित भी करता है। इस प्रकार ईश्वर को समझने के लिए इन सभी छह रूपों को समझना होता है। जैसे जैसे एक एक कर हम इनको समझते जाते हैं हम ईश्वर को समझते जाते हैं , उनको पाते जाते हैं। ईश्वर इन छह रूपों में अलग अलग  समझे जाने के बावजूद सम्पूर्ण रूप से तभी समझ में आते हैं जब इन छहों रूपों को  एक साथ उनकी समग्रता में समझ पाते हैं। यानी whole is better than sum of the parts.

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