श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 11

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ ।।11।।

वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा। ।।11।।
व्यक्ति के जीवन के लक्ष्य क्या होते हैं? क्या बहुत पैसा, बहुत बड़ा पद, बहुत अधिक सत्ता, बहुत ऊँचे स्तर की कोई अन्य उपलब्धि? क्या इतने भर से आपको वो चीज हासिल हो जाती है जिससे आपको अपने होने का शकुन मिलता हो? निश्चित ही नहीं क्योंकि इन सबों को  हासिल कर लेने के बाद भी व्यक्ति अपने अधूरेपन के साथ ही जीता है। दरअसल आपकी भौतिक उपलब्धि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जब तक आप खुद को नहीं खोज लेते आपके परिश्रम आपको शांति नहीं दे पाते हैं। इसी चीज को यानी अपनी ही आत्मा को, अपने ही सेल्फ को पाने को ईश्वर की प्राप्ति भी कहते हैं क्योंकि आप ही वास्तव में  ब्रह्म हैं जो आपको नहीं ज्ञात है। 
          इसी ब्रह्म को पाने के विधान को समझने के लिए हम कर्मयोग का मार्ग चुनते हैं, ज्ञानयोग और सन्यास योग का मार्ग चुनते हैं और इसी कड़ी में हम भक्ति योग का भी मार्ग चुनते हैं और ये सभी मार्ग अपने में पूर्ण होते हुए भी एक दूसरे के पूरक भी होते हैं। वेदों के ज्ञाता हों या राग मुक्त सन्यासी महात्मा हों या फिर ब्रह्म प्राप्ति का आचरण करने वाले हों सभी इसी ब्रह्म की प्राप्ति हेतु यत्नशील होते हैं।
        

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